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Thursday, September 27, 2012
Saturday, September 22, 2012
Sunday, August 5, 2012
Friday, August 3, 2012
आर्थिक समाचार
बिजली में सुधार नहीं करने वाले सूबों के खिलाफ होगी सख्ती
नई दिल्ली : इस हफ्ते की बिजली संकट का तजुर्बा कहिए या फिर बदले हुए निजाम का असर। कारण जो भी रहा हो राज्य अब बिजली सुधार के एजेंडे को दरकिनार नहीं कर सकेंगे। बिजली मंत्रालय उन राज्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा, जिनकी वजह से पूरे देश में बिजली सुधार पर ग्रहण लग गया है। नवनियुक्त बिजली मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने मंत्रालय के अफसरों के साथ अपनी पहली बैठक में यह साफ निर्देश दिया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान राज्यों में बिजली सुधार पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाए। बिजली मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक बुधवार को एक आंतरिक बैठक में अगले एक वर्ष का एजेंडा तय कर लिया गया। इसके मुताबिक केंद्र सरकार अब राज्यों में बिजली सुधार को लेकर होने वाली राजनीति पर चुप नहीं बैठेगी। बिजली सुधार के लिए राज्य सरकारें क्या कदम उठा रही हैं, इसकी निर्धारित अंतराल पर समीक्षा के लिए बिजली मंत्रालय में समिति का गठन होगा। समिति की रिपोर्ट के आधार पर सुधार के मानकों पर सुस्ती दिखाने वाले राज्यों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार की यह सख्ती काम कर गई तो बिजली दरों को लेकर होने वाली राजनीति पर रोक लग सकती है। वैसे बिजली मंत्रालय और योजना आयोग के साथ इस महीने के शुरुआत में हुई बैठक में राज्यों ने हर वर्ष बिजली की दरों को संशोधित करने पर अपनी सहमति दे दी है। अब बिजली मंत्रालय इस बात की सख्त निगरानी करेगा कि बिजली की दरों मे एक निश्चित अंतराल पर वृद्धि हो। उक्त बैठक में बिजली मंत्री ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जब तक राज्य पूरी तरह से बिजली सुधार को लागू नहीं करेंगे तब तक ग्रिड के असफल होने का खतरा बरकरार रहेगा। बिजली दरों में वृद्धि के साथ ही इस बात की भी कड़ी निगरानी की जाएगी कि राज्यों की बिजली यूनिटों की तकनीकी और वाणिज्यक हानि (एटीएंडसी) कितनी है। इसे कम करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। 11वीं योजना के अंत तक सरकार ने हर राज्य के लिए तकनीकी व वाणिज्यिक हानि के स्तर को घटाकर 15 फीसद करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश सहित कुछ गिने-चुने राज्यों को छोड़ दें तो अधिकांश सूबे इस पैमाने पर फिसड्डी साबित हुए हैं। अगर इस हानि का स्तर ज्यादा है तो इसका मतलब है कि राज्य बेची गई बिजली की पूरी कीमत नहीं वसूल रहे हैं।Thursday, August 2, 2012
Wednesday, August 1, 2012
आर्थिक समाचार
किसानों को डीजल पर 50 फीसद सब्सिडी
नई दिल्ली : देश के सवा तीन सौ जिलों में पड़े सूखे से निपटने की तैयारी में सरकार जुट गई है। पेयजल और चारे की आपूर्ति उसकी पहली प्राथमिकता है। खेतों में खड़ी खरीफ फसलों की सिंचाई के लिए किसानों को डीजल पर 50 फीसद की सब्सिडी देने की घोषणा की है। सूखाग्रस्त राज्यों को राहत के तौर पर लगभग दो हजार करोड़ रुपये की मदद की घोषणा की गई है। यह फैसला मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह (ईजीओएम) की मंगलवार को हुई बैठक में लिया गया। इस बैठक में 68 फीसद कम बारिश से जूझ रहे हरियाणा और पंजाब को उनकी बिजली की मांग पर कोई फैसला नहीं किया जा सका। सरकार के फैसलों के बारे में जानकारी देने आए कृषि मंत्री शरद पवार ने इस बारे में बताया कि इन राज्यों की मांगों पर ईजीओएम की अगली बैठक में विचार किया जाएगा। ईजीओएम ने जल संरक्षण प्रबंधन कार्यक्रम के लिए 1,440 करोड़ रुपये मंजूर किए। इसके तहत कर्नाटक को 195 करोड़, महाराष्ट्र को 501 करोड़, राजस्थान को 424 करोड़ और गुजरात को 320 करोड़ रुपये देने की घोषणा की गई। डीजल सब्सिडी के तौर पर 50 फीसद की छूट देने का एलान किया गया। पवार ने कहा कि इस सब्सिडी का बोझ केंद्र व राज्य बराबर-बराबर उठाएंगे। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 453 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई। इसका लाभ महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और हरियाणा को दिया गया। विभिन्न फसलों की दुबारा बुवाई के लिए बीजों पर भी सब्सिडी का प्रावधान किया गया है। पवार ने बताया कि सभी राज्यों को पर्याप्त मात्रा में बीज उपलब्ध करा दिया गया है। चारे के बढ़ते मूल्य पर काबू पाने के लिए सरकार ने पशुचारे में उपयोग होने वाले खल के आयात को शुल्क मुक्त कर दिया गया है। चारे के लिए 50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मदद देने का निर्णय किया गया है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के लगभग 400 जिलों में औसत से कम बारिश हो रही है। सबसे कम बारिश हरियाणा और पंजाब में हुई है। इन दोनों राज्यों में औसत से 68 फीसद कम बरसात हुई है।Friday, July 27, 2012
Wednesday, July 25, 2012
Tuesday, July 24, 2012
Monday, July 23, 2012
लाइबोर के चोर
अरे उन्होंने लाइबोर चुरा लिया!! लाइबोर क्या?? लाइबोर यानी दुनिया के वित्तीय सिस्टम की सांस! लाइबोर यानी ग्लोबल बैंकिंग का सबसे कीमती आंकड़ा! दुनिया भर में बैंक कर्ज पर ब्याज दर तय करने का दैनिक पैमाना। लाइबोर जिसे देखकर टोक्यो से न्यूयॉर्क तक और वेलिंगटन से सैंटियागो तक बैंक रोज अपनी दुकानें खोलते हैं। लाइबोर (लंदन इंटरबैंक ऑफर्ड रेट-ब्याज दर) जो रोज यह तय करता है कि दुनिया भर की कंपनी, उपभोक्ता, सरकारों को करीब 15 मुद्राओं में अलग-अलग तरह के कर्ज किस ब्याज दर पर दिए जाएंगे। दुनिया में करीब 800 ट्रिलियन डॉलर का वित्तीय कारोबार जिस सबसे अहम पैमाने पर बंधा है, उस लाइबोर को, एक दर्जन छंटे हुए बैंक ले उड़े। उनके फायदे के लिए लाइबोर दो साल तक झूठे आंकड़ों के आधार पर मनमाने ढंग से तय हुआ और पूरी दुनिया निरी बेवकूफ बनती रही। पूरा वित्तीय जगत सन्न है। लाइबोर की चोरी वित्तीय दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा संगठित वित्तीय अपराध साबित हो रहा है। पहले से ही बदनाम ग्लोबल बैंकिंग की पूरी संस्कृति ही अब दागी हो गई है। एक पुरानी अमेरिकी कहावत सच लग रही है कि बैंकों को लूटना सीखने की जरूरत नहीं है, यह काम उन्हें पहले से आता है। बैंक की नोक पर वित्तीय बाजारों में कहा जाता है कि आप लाइबोर में कोई दिलचस्पी न रखते हों, लेकिन वह आपमें पूरी रुचि रखता है। लंदन की घडि़यों में रोज सुबह 11 बजे से 11.10 तक का वक्त पूरी दुनिया के बैंकिंग उद्योग के लिए सबसे कीमती होता है। इन दस मिनट के भीतर यह तय हो जाता है कि सरकारों से लेकर उपभोक्ताओं तक बैंक कर्ज से लेकर जटिल वित्तीय निवेश (डेरीवेटिव) पर क्या ब्याज दर लगेगी। लाइबोर को देखकर विश्र्व के बैंक अलग-अलग तरह के कर्जो पर अपनी ब्याज दरें तय करते हैं। लाइबोर का दैनिक उतार-चढ़ाव बैंकों की वित्तीय सेहत का प्रमाण होता है। ऊंची लाइबोर (ब्याज) दर बैंकों की खराब सेहत और निचली दर बैंकों की खुशहाली का सबूत है। लाइबोर जटिल हो सकता है, लेकिन इसका घोटाला बड़ी आसानी से हुआ और दो साल तक चला। बात 2007 से 2009 केबीच की है जब अमेरिकी बैंक संकट व जोखिम भरे निवेशों के कारण कमजोर हो चुके थे। उस वक्त लाइबोर दर ऊंची होनी चाहिए, ताकि बैंकों की सेहत का सही अंदाज मिल सके। लेकिन लाइबोर की गणना में शामिल बैंकों ने ब्याज दरों के गलत आंकड़े दिए ताकि दर कम रहे और कर्ज की मांग बनी रहे। यह कर्ज लेने के लिए अपनी सही कमाई को छुपाने जैसा था। लाइबोर को ब्रिटिश बैंकर्स एसोसिएशन तय करती है, जिसके सदस्य बैंक अंतर बैंक लेनदेन के लिए ब्याज दर का आकलन देते हैं। इन आंकड़ों को वित्तीय समाचार व विश्लेषण एजेंसी थॉमसन रायटर्स विश्लेषित करती है। सबसे ऊंची और सबसे नीचे की दरों को हटाने के बाद जो औसत बचता है वही लाइबोर है, जो दुनिया में अरबों डॉलर के कर्ज की निर्धारक ब्याज दर है। इन चुनिंदा बडे़ बैंकों की करामात उन बैंकों पर बहुत भारी पड़ी जो खुले बाजार में कर्ज दे रहे थे। खराब वित्तीय सेहत के बावजूद उन्हें सस्ते कर्ज देने पड़े और उन्हें कम रिटर्न मिला। लाइबोर से प्रभावित वित्तीय सौदों का आकार इतना बड़ा है कि दुनिया के इतिहास का हर घोटाला इसके सामने पानी भरेगा। संगठित गिरोह लाइबोर के दिनदहाड़े अपहरण से पूरी दुनिया का बैंकिंग उद्योग थरथरा रहा है। करीब 12 बैंक (जेपी मोर्गन, बार्कलेज, सिटीबैंक, बीएनपी परिबा, एचएसबीसी, बैंक ऑफ टोक्यो, मित्सुबिशी आदि) इस घोटाले में शामिल पाए गए हैं। ब्रिटेन के प्रमुख बैंक बार्कलेज पर 452 अरब डॅालर का जुर्माना लग गया है। नुकसान उठाने वाली दुनिया भर की सरकारें, बैंक और निवेशक बैंकों के खिलाफ भारी मुकदमों की तैयारी कर रहे हैं। यूरोप व अमेरिका के विशेषज्ञ इसे बैंकिंग उद्योग का टोबैको मूमेंट कह रहे हैं। जैसे 1998 में अमेरिकी सिगरेट कंपनियों को मुकदमों में फंसकर 200 अरब डॉलर चुकाने पडे़ थे, ठीक उसी तरह लाइबोर घोटाले में शामिल करीब एक दर्जन बैंकों को भारी हर्जाना चुकाना पड़ेगा। इन बैंकों पर करीब 22 अरब डॉलर की पेनाल्टी लगाने का फैसला पहले ही हो गया है। हर्जानों के मुकदमों की गिनती अब शुरू हो रही है। यह ग्लोबल बैंकिंग का सबसे बुरा चेहरा है। घोटाला खुला तो पता चला कि लाइबोर जैसे प्रमुख ग्लोबल वित्तीय पैमाने कितने तदर्थ ढंग से तय किए जाते हैं। दुनिया में अरबों डॉलर के लेनदेन का बुनियादी पैमाना कोई नियामक संस्था नहीं, बल्कि कारोबारियों की एक समिति (ब्रिटिश बैंकर्स एसो.) तय करती है। अर्थात दुनिया का असली बैंकिंग कारोबार पूरी तरह विनियमन से बाहर है। आम लोगों को हैरत इस बात पर है कि अमेरिकी वित्त मंत्री टिमोथी गेथनर से लेकर बैंक ऑफ इंग्लैंड के प्रमुख मर्विन किंग तक सभी इस चोरी को जानते थे (2008 के ई-मेल), मगर इसे रोकने की कोशिश नहीं हुई। रही बात बैंकों की तो उनके आपराधिक लालच का इतिहास अब बहुत अमीर हो गया है। तेज मुनाफों के लिए वह किसी भी कीमत तक जा सकते हैं। यही वजह है कि जब दुनिया लाइबोर को ब्रह्म वाक्य मानकर ब्याज दरें तय कर रही थी, तब लाइबोर एक्सचेंज पर ब्याज दर दर्ज कराने वाले ट्रेडर एक-दूसरे को यह संदेश (ई-मेल व दस्तावेज) भेज रहे थे कि बॉस कॉम हो गया, हम शाम को पार्टी करेंगे और शैंपेन खोलेंगे। आज अगर लंदन या न्यूयॉर्क की सड़कों पर कोई यह चीखे कि वित्तीय दुनिया चोरों से भरी पड़ी है और दुनिया के शीर्ष पेशेवर दरअसल सबसे बड़े लुटेरे हैं, उस पर भरोसा कर लीजिएगा। वजह यह है कि ग्लोबल बैंकों का लालच अब अपराध में बदल गया है। भारत में माइबोर (मुंबई इंटरबैंक ऑफर्ड रेट) लाइबोर का सहोदर है। लाइबोर घोटाले के बाद माइबोर ही क्यों, यूरीबोर (यूरो इंटरबैंक ऑफर्ड रेट) और टोईबोर (टोक्यो) भी सवालों केघेरे में हैं, क्योंकि लालची बैंक कहीं कुछ कर सकते हैं। पूरी दुनिया बैंकिंग कानूनों में गजब की सख्ती मांग रही है और बैकिंग नियामकों की कमजोरी पर लानते भेज रही है। लाइबोर की दिनदहाडे़ लूट देखने के बाद किसे भरोसा होगा कि विश्र्व का वित्तीय भविष्य इन बैंकरों के हाथ में सुरक्षित है? बात पुरानी है, मगर सही है कि आप किसी को बंदूक दीजिए तो वह बैंक लूटेगा। मगर किसी को एक बैंक दे दीजिए तो वह दुनिया लूट लेगा।.. हमें तो हमारे भरोसे (बैंक यानी भरोसा) ने ही लूट लिया है।
Sunday, July 22, 2012
Saturday, July 21, 2012
Friday, July 20, 2012
Thursday, July 19, 2012
फिर विकराल रूप दिखाएगी महंगाई
नई दिल्ली : महंगाई फिर बेलगाम होने की तरफ बढ़ चली है। कच्चे तेल के दामों में फिर से उबाल, रुपये की कमजोरी और मानसून की देरी मिलकर महंगाई पर काबू पाने की सरकारी मंशा पर इस साल भी पानी फेर सकती हैं। थोक और खुदरा कीमतों पर आधारित महंगाई की दरें जून, 2012 में भी 10 फीसद से ऊपर बनी रहीं। ऐसे में इस महीने ब्याज दरों में कमी की उम्मीद लगाए लोगों और उद्योग जगत को निराशा हाथ लग सकती है। आम जनता की चिंता बढ़ाने को इतना ही काफी था। ऊपर से कृषि मंत्री शरद पवार ने चारे में कमी के बहाने दूध के दामों में और वृद्धि के संकेत दे दिए हैं। सरकार की तरफ से बुधवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक खुदरा मूल्य आधारित महंगाई की दर जून में 10.02 फीसद रही। इसके पिछले महीने यह 10.36 फीसद थी। इस दौरान सब्जियों की खुदरा कीमत में 27.60, खाद्य तेलों में 16.58 और दुग्ध उत्पादों में 12.75 फीसद की वृद्धि हुई है। जानकारों का कहना है कि इन तीनों उत्पादों के दामों में हाल-फिलहाल नरमी के आसार नहीं हैं। कुल महंगाई में इनकी हिस्सेदारी 27 फीसद है। इन आंकड़ों के अलावा भी कई अन्य वजहें हैं जो संकेत दे रही हैं कि आने वाले दिनों में महंगाई का विकराल रूप फिर देखने को मिल सकता है। कच्चा तेल एक महीने के अंतराल पर फिर 100 डॉलर का स्तर पार कर गया। बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके दाम 104 डॉलर प्रति बैरल रहे। इस वजह से तेल कंपनियां जून के अंत में पेट्रोल को महंगा कर सकती हैं। सरकार पहले ही डीजल को महंगा करने की तैयारी में है। इसकी घोषणा राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव के बाद होने के आसार हैं। क्रूड महंगा होने से तेल कंपनियों को डीजल पर होने वाली संभावित हानि (अंडररिकवरी) 6.70 रुपये से बढ़कर 10.40 रुपये प्रति लीटर हो गई है। रसोई गैस और केरोसीन पर भी अंडररिकवरी बढ़ गई है। पेट्रोल और डीजल के महंगा होने का असर भी महंगाई दर पर पड़ेगा। मानसून में देरी की खबर पक्की होने के बाद वैसे ही सरकार महंगाई प्रबंधन को लेकर खासी उधेड़बुन में है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने राज्यों से सूखा आपदा प्रबंधन को लेकर सतर्क रहने की चेतावनी भी दे डाली है। पवार ने तो परोक्ष तौर पर दूध महंगा होने के संकेत भी दे दिए हैं। उन्होंने बुधवार को कहा कि बारिश में कमी से इस साल चारा उत्पादन 40 फीसद घटेगा। चारे के इस संकट से दूध उत्पादन में कमी आएगी। नतीजतन दूध कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना है। कच्चे तेल के अलावा महंगाई बढ़ाने की कुछ और वजहें भी विदेश से जुड़ी हैं। अमेरिका में सूखे का प्रकोप गहराने की खबर है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का, सोयाबीन और गेहूं की कीमतों में तेजी आनी शुरू हो चुकी है। इससे घरेलू बाजार में भी मक्का दो फीसद महंगा हो गया है। जानकारों की मानें तो खाद्य तेलों की कीमतें काफी ऊपर जा सकती हैं। रही सही कसर रुपये की कमजोरी निकाल रही है। यह अब भी साढ़े पचपन रुपये प्रति डॉलर के आसपास है। इन सब वजहों से रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना आसान नहीं होगा। केंद्रीय बैंक वार्षिक मौद्रिक नीति की पहली तिमाही समीक्षा इस माह के आखिरी दिन पेश करेगा। औद्योगिक सुस्ती से निजात पाने के लिए सरकार और उद्योग जगत रिजर्व बैंक से लगातार आग्रह कर रहे हैं कि ब्याज दरों को घटाया जाए। मगर महंगाई के मौजूदा सूरतेहाल के बीच दरें घटने की उम्मीद कम ही है।
कोयला मंडी
झरिया : झरिया कोयला मंडी में आज कोयले के भाव निम्न प्रकार रहे। 1. कोयला (स्टीम) - 6500-7200 रुपये प्रतिटन 2. कोयला (स्लैग)- 4000-4500 रुपये प्रतिटन 3. कोयला (हार्डकोक लोवेस्ट-ए ग्रेड)- 10000-11000 रुपये प्रतिटन 4. कोयला (हार्डकोक-एक नंबर) 8000-8500 रुपये प्रतिटन 5. स्लरी प्रतिटन- भेलाटाँड़-4000 चासनाला-4000 , जामाडोबा-4000
Wednesday, July 18, 2012
देश में कोयले की मांग और आपूॢत में 6.13 करोड़ टन का अंतर
एटीपीसी ने कोयला आयात के लिए निविदाएं मंगाई
इंडियन कोल मार्केट वाच ने प्रस्तुत की अपनी रिपोर्ट
देश में कोयले की मांग और आपूॢत के बीच वर्ष 2011-12 में छह करोड़ 13 लाख 70 हजार टन का अंतर रहने का अनुमान है। भारतीय कोयला बाजार पर नजर रखने वाले संगठन इंडियन कोल मार्केट वाच ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी देते हुए कहा है कि वर्ष 2011-12 में नौ करोड़ 89 लाख 30 हजार टन कोयला आयात किए जाने का अनुमान है। संगठन ने कोयला मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि कोकिंग कोल की आपूॢत में 4.2 करोड़ टन से पांच करोड़ टन के बीच का अंतर है और स्टीम कोयले में यह अंतर क्रमश: 2.87 करोड़ 60 हजार टन और 8.93 करोड़ 40 हजार टन का है। कुल आयात 11.81 करोड़ टन रहा है। इसमें कहा गया है कि मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक कोयला आयात हालांकि नौ करोड़ 89 लाख 30 हजार टन है, जो अक्टूबर 2011 तक आयातित छह करोड़ 14 लाख 91 हजार टन के आंकड़ों पर आधारित है। मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2011-12 में कोयले की मांग 69 करोड़ 60 लाख 30 हजार टन रहने का अनुमान है और घरेलू उपलब्धता 53 करोड़ 57 लाख 30 हजार टन रहने की उम्मीद जताई गई है। इसके मद्देनजर मांग और आपूर्ति में 16 करोड़ तीन लाख टन का अंतर है।
देश की अग्रणी ऊर्जा उत्पादन कंपनी राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) ने अपने आठवें ऊर्जा संयंत्र के लिए २० लाख टन कोयला आयात की वैश्विक निविदाएं आमंत्रित की हैं। इंडिया कोल माॢकट वाच के अनुसार कंपनी ने अपने फरक्का और कहलगांव स्थित संयंत्रों के लिए ११ लाख अन कोयला और दादरी, रिहन्द, ङ्क्षसगरौली, टांडा, ऊंचाहार, तथा विध्यांचल संयंत्रों के वास्ते नौ लाख टन कोयला खरीद की योजना बनाई है। कंपनी ने ये निविदाएं १३ जुलाई को आमंत्रित की है।
इंडियन कोल मार्केट वाच ने प्रस्तुत की अपनी रिपोर्ट
देश में कोयले की मांग और आपूॢत के बीच वर्ष 2011-12 में छह करोड़ 13 लाख 70 हजार टन का अंतर रहने का अनुमान है। भारतीय कोयला बाजार पर नजर रखने वाले संगठन इंडियन कोल मार्केट वाच ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी देते हुए कहा है कि वर्ष 2011-12 में नौ करोड़ 89 लाख 30 हजार टन कोयला आयात किए जाने का अनुमान है। संगठन ने कोयला मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि कोकिंग कोल की आपूॢत में 4.2 करोड़ टन से पांच करोड़ टन के बीच का अंतर है और स्टीम कोयले में यह अंतर क्रमश: 2.87 करोड़ 60 हजार टन और 8.93 करोड़ 40 हजार टन का है। कुल आयात 11.81 करोड़ टन रहा है। इसमें कहा गया है कि मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक कोयला आयात हालांकि नौ करोड़ 89 लाख 30 हजार टन है, जो अक्टूबर 2011 तक आयातित छह करोड़ 14 लाख 91 हजार टन के आंकड़ों पर आधारित है। मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2011-12 में कोयले की मांग 69 करोड़ 60 लाख 30 हजार टन रहने का अनुमान है और घरेलू उपलब्धता 53 करोड़ 57 लाख 30 हजार टन रहने की उम्मीद जताई गई है। इसके मद्देनजर मांग और आपूर्ति में 16 करोड़ तीन लाख टन का अंतर है।
देश की अग्रणी ऊर्जा उत्पादन कंपनी राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) ने अपने आठवें ऊर्जा संयंत्र के लिए २० लाख टन कोयला आयात की वैश्विक निविदाएं आमंत्रित की हैं। इंडिया कोल माॢकट वाच के अनुसार कंपनी ने अपने फरक्का और कहलगांव स्थित संयंत्रों के लिए ११ लाख अन कोयला और दादरी, रिहन्द, ङ्क्षसगरौली, टांडा, ऊंचाहार, तथा विध्यांचल संयंत्रों के वास्ते नौ लाख टन कोयला खरीद की योजना बनाई है। कंपनी ने ये निविदाएं १३ जुलाई को आमंत्रित की है।
सीबीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल होगी फाइनेंशियल एजुकेशन!
किन बातों पर देंगे जोर
योजना
साक्षरता को बढ़ावा
रिजर्व बैंक ने जारी 'वित्तीय शिक्षा पर राष्ट्रीय रणनीति पत्र' के मसौदे में दिया बड़े अभियान का सुझाव
बिजनेस भास्कर त्न मुंबई
लोगों में वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तैयारी पूरी कर ली है। इसके लिए स्कूल स्तर पर ही बच्चों को फाइनेंशियल एजुकेशन की जानकारी देने की कवायद की जा रही है।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) इस दिशा में पहल करते हुए 8वीं से आगे की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में फाइनेंशियल एजुकेशन को स्थायी रूप से शामिल कर सकता है। रिजर्व बैंक ने सोमवार को जारी 'वित्तीय शिक्षा पर राष्ट्रीय रणनीति पत्र' के मसौदे में कहा है कि फाइनेंशियल एजुकेशन एक बहुत ही महत्वपूर्ण जीवन कौशल है। इसलिए हमारे एजुकेशन सिस्टम को इस जीवन कौशल से अनिवार्य रूप से परिचित कराना चाहिए। इसके बिना शिक्षा अधूरी है। रिजर्व बैंक ने यह मसौदा टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के लिए जारी किया है। साथ ही सभी सरकारी एजेंसियों की मदद से एक बड़ा अभियान वित्तीय जागरुकता के लिए चलाया जा रहा है ताकि देश को वित्तीय मामलों के प्रति सशक्त और जागरूक बनाया जा सके।
मसौदे में कहा गया है कि हमारे देश में बहुत से छात्रों को स्कूल स्तर से आगे की पढ़ाई करने का मौका नहीं मिल पाता है। यही बात छात्राओं के मामले में भी लागू होती है। ऐसे में स्कूल एजुकेशन में इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि ऐसे छात्र-छात्राओं के लिए औपचारिक रूप से वित्तीय शिक्षा लेने का यह आखिरी अवसर हो सकता है। रिजर्व बैंक ने कहा है कि सीबीएसई ने वित्तीय साक्षरता के कदम की सराहना की है, क्योंकि किसी की भी जिंदगी में पर्सनल फाइनेंस को हैंडल करने के लिए यह बहुत उपयोगी है।
सीबीएसई सैद्धांतिक रूप से इस बात के लिए सहमत हुई है और फाइनेंशियल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित करेगी। रिजर्व बैंक ने कहा है कि वित्तीय साक्षरता फैलाने के लिए बहुत से देश फाइनेंशियल एजुकेशन पर समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपना रहे हैं। मसौदे में कहा गया है कि राष्ट्रीय रणनीति का मकसद बड़े पैमाने पर वित्तीय शिक्षा अभियान चलाकर लोगों को अपनी पूंजी का बेहत प्रबंधन सिखाने में मदद करना है। वित्तीय मामलों की समझ बढऩे से लोग वित्तीय उत्पाद और सेवाओं का चयन बेहतर ढंग से कर सकेंगे। इससे उपभोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण तंत्र भी ज्यादा पारदर्शी हो सकेगा।
केंद्रीय बैंक का मानना है कि वित्तीय समावेशन और समावेशी विकास में वित्तीय साक्षरता और वित्तीय शिक्षा महत्वपूर्ण भूूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय सेवाओं का लाभ ज्यादा बेहतर तरीके से इसके बाद लोग उठा सकते हैं। मसौदे में रिजर्व बैंक ने इस बात पर भी जोर दिया है कि निरक्षर लोगों को वित्तीय साक्षरता की इससे भी सख्त जरूरत है। निरक्षर लोगों को वित्तीय रूप से साक्षर बनाने के लिए इन्नोवेटिव पाठ्यक्रम, कार्यप्रणाली और वितरण चैनल की जरूरत है।
जीवन में बचत का महत्व, जोखिम भरे लोन जो चुकाने की क्षमता से बाहर हों, वित्तीय सेक्टर के उचित संस्थानों से ही कर्ज लेने, लंबे समय तक की गई बचत से चक्रवृद्धि ब्याज के फायदे, पूंजी की वैल्यू, महंगाई दर, इंश्योरेंस की जरूरत आदि के बारे में समझ विकसित की जाएग। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों, नियामकों, बैंकों, स्टॉक एक्सचेंज, बीमा कंपनियों, म्यूचुअल फंड्स आदि की कार्यप्रणाली के बारे में बताया जाएगा।
> सीबीएसई फाइनेंशियल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित करेगा
> स्कूल स्तर से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाने वाले छात्र-छात्राओं के जीवन में बड़ी काम आएगी
> वित्तीय मामलों की समझ बढऩे से लोग वित्तीय उत्पाद और सेवाओं का चयन बेहतर ढंग से कर सकेंगे
> करीब 50 करोड़ की युवा आबादी को बचत, निवेश, वित्तीय उत्पादों की जानकारी
योजना
साक्षरता को बढ़ावा
रिजर्व बैंक ने जारी 'वित्तीय शिक्षा पर राष्ट्रीय रणनीति पत्र' के मसौदे में दिया बड़े अभियान का सुझाव
बिजनेस भास्कर त्न मुंबई
लोगों में वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने तैयारी पूरी कर ली है। इसके लिए स्कूल स्तर पर ही बच्चों को फाइनेंशियल एजुकेशन की जानकारी देने की कवायद की जा रही है।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) इस दिशा में पहल करते हुए 8वीं से आगे की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में फाइनेंशियल एजुकेशन को स्थायी रूप से शामिल कर सकता है। रिजर्व बैंक ने सोमवार को जारी 'वित्तीय शिक्षा पर राष्ट्रीय रणनीति पत्र' के मसौदे में कहा है कि फाइनेंशियल एजुकेशन एक बहुत ही महत्वपूर्ण जीवन कौशल है। इसलिए हमारे एजुकेशन सिस्टम को इस जीवन कौशल से अनिवार्य रूप से परिचित कराना चाहिए। इसके बिना शिक्षा अधूरी है। रिजर्व बैंक ने यह मसौदा टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के लिए जारी किया है। साथ ही सभी सरकारी एजेंसियों की मदद से एक बड़ा अभियान वित्तीय जागरुकता के लिए चलाया जा रहा है ताकि देश को वित्तीय मामलों के प्रति सशक्त और जागरूक बनाया जा सके।
मसौदे में कहा गया है कि हमारे देश में बहुत से छात्रों को स्कूल स्तर से आगे की पढ़ाई करने का मौका नहीं मिल पाता है। यही बात छात्राओं के मामले में भी लागू होती है। ऐसे में स्कूल एजुकेशन में इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि ऐसे छात्र-छात्राओं के लिए औपचारिक रूप से वित्तीय शिक्षा लेने का यह आखिरी अवसर हो सकता है। रिजर्व बैंक ने कहा है कि सीबीएसई ने वित्तीय साक्षरता के कदम की सराहना की है, क्योंकि किसी की भी जिंदगी में पर्सनल फाइनेंस को हैंडल करने के लिए यह बहुत उपयोगी है।
सीबीएसई सैद्धांतिक रूप से इस बात के लिए सहमत हुई है और फाइनेंशियल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित करेगी। रिजर्व बैंक ने कहा है कि वित्तीय साक्षरता फैलाने के लिए बहुत से देश फाइनेंशियल एजुकेशन पर समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपना रहे हैं। मसौदे में कहा गया है कि राष्ट्रीय रणनीति का मकसद बड़े पैमाने पर वित्तीय शिक्षा अभियान चलाकर लोगों को अपनी पूंजी का बेहत प्रबंधन सिखाने में मदद करना है। वित्तीय मामलों की समझ बढऩे से लोग वित्तीय उत्पाद और सेवाओं का चयन बेहतर ढंग से कर सकेंगे। इससे उपभोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण तंत्र भी ज्यादा पारदर्शी हो सकेगा।
केंद्रीय बैंक का मानना है कि वित्तीय समावेशन और समावेशी विकास में वित्तीय साक्षरता और वित्तीय शिक्षा महत्वपूर्ण भूूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय सेवाओं का लाभ ज्यादा बेहतर तरीके से इसके बाद लोग उठा सकते हैं। मसौदे में रिजर्व बैंक ने इस बात पर भी जोर दिया है कि निरक्षर लोगों को वित्तीय साक्षरता की इससे भी सख्त जरूरत है। निरक्षर लोगों को वित्तीय रूप से साक्षर बनाने के लिए इन्नोवेटिव पाठ्यक्रम, कार्यप्रणाली और वितरण चैनल की जरूरत है।
जीवन में बचत का महत्व, जोखिम भरे लोन जो चुकाने की क्षमता से बाहर हों, वित्तीय सेक्टर के उचित संस्थानों से ही कर्ज लेने, लंबे समय तक की गई बचत से चक्रवृद्धि ब्याज के फायदे, पूंजी की वैल्यू, महंगाई दर, इंश्योरेंस की जरूरत आदि के बारे में समझ विकसित की जाएग। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों, नियामकों, बैंकों, स्टॉक एक्सचेंज, बीमा कंपनियों, म्यूचुअल फंड्स आदि की कार्यप्रणाली के बारे में बताया जाएगा।
> सीबीएसई फाइनेंशियल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित करेगा
> स्कूल स्तर से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाने वाले छात्र-छात्राओं के जीवन में बड़ी काम आएगी
> वित्तीय मामलों की समझ बढऩे से लोग वित्तीय उत्पाद और सेवाओं का चयन बेहतर ढंग से कर सकेंगे
> करीब 50 करोड़ की युवा आबादी को बचत, निवेश, वित्तीय उत्पादों की जानकारी
Tuesday, July 17, 2012
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