Monday, July 23, 2012

लाइबोर के चोर

अरे उन्होंने लाइबोर चुरा लिया!! लाइबोर क्या?? लाइबोर यानी दुनिया के वित्तीय सिस्टम की सांस! लाइबोर यानी ग्लोबल बैंकिंग का सबसे कीमती आंकड़ा! दुनिया भर में बैंक कर्ज पर ब्याज दर तय करने का दैनिक पैमाना। लाइबोर जिसे देखकर टोक्यो से न्यूयॉर्क तक और वेलिंगटन से सैंटियागो तक बैंक रोज अपनी दुकानें खोलते हैं। लाइबोर (लंदन इंटरबैंक ऑफर्ड रेट-ब्याज दर) जो रोज यह तय करता है कि दुनिया भर की कंपनी, उपभोक्ता, सरकारों को करीब 15 मुद्राओं में अलग-अलग तरह के कर्ज किस ब्याज दर पर दिए जाएंगे। दुनिया में करीब 800 ट्रिलियन डॉलर का वित्तीय कारोबार जिस सबसे अहम पैमाने पर बंधा है, उस लाइबोर को, एक दर्जन छंटे हुए बैंक ले उड़े। उनके फायदे के लिए लाइबोर दो साल तक झूठे आंकड़ों के आधार पर मनमाने ढंग से तय हुआ और पूरी दुनिया निरी बेवकूफ बनती रही। पूरा वित्तीय जगत सन्न है। लाइबोर की चोरी वित्तीय दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा संगठित वित्तीय अपराध साबित हो रहा है। पहले से ही बदनाम ग्लोबल बैंकिंग की पूरी संस्कृति ही अब दागी हो गई है। एक पुरानी अमेरिकी कहावत सच लग रही है कि बैंकों को लूटना सीखने की जरूरत नहीं है, यह काम उन्हें पहले से आता है। बैंक की नोक पर वित्तीय बाजारों में कहा जाता है कि आप लाइबोर में कोई दिलचस्पी न रखते हों, लेकिन वह आपमें पूरी रुचि रखता है। लंदन की घडि़यों में रोज सुबह 11 बजे से 11.10 तक का वक्त पूरी दुनिया के बैंकिंग उद्योग के लिए सबसे कीमती होता है। इन दस मिनट के भीतर यह तय हो जाता है कि सरकारों से लेकर उपभोक्ताओं तक बैंक कर्ज से लेकर जटिल वित्तीय निवेश (डेरीवेटिव) पर क्या ब्याज दर लगेगी। लाइबोर को देखकर विश्र्व के बैंक अलग-अलग तरह के कर्जो पर अपनी ब्याज दरें तय करते हैं। लाइबोर का दैनिक उतार-चढ़ाव बैंकों की वित्तीय सेहत का प्रमाण होता है। ऊंची लाइबोर (ब्याज) दर बैंकों की खराब सेहत और निचली दर बैंकों की खुशहाली का सबूत है। लाइबोर जटिल हो सकता है, लेकिन इसका घोटाला बड़ी आसानी से हुआ और दो साल तक चला। बात 2007 से 2009 केबीच की है जब अमेरिकी बैंक संकट व जोखिम भरे निवेशों के कारण कमजोर हो चुके थे। उस वक्त लाइबोर दर ऊंची होनी चाहिए, ताकि बैंकों की सेहत का सही अंदाज मिल सके। लेकिन लाइबोर की गणना में शामिल बैंकों ने ब्याज दरों के गलत आंकड़े दिए ताकि दर कम रहे और कर्ज की मांग बनी रहे। यह कर्ज लेने के लिए अपनी सही कमाई को छुपाने जैसा था। लाइबोर को ब्रिटिश बैंकर्स एसोसिएशन तय करती है, जिसके सदस्य बैंक अंतर बैंक लेनदेन के लिए ब्याज दर का आकलन देते हैं। इन आंकड़ों को वित्तीय समाचार व विश्लेषण एजेंसी थॉमसन रायटर्स विश्लेषित करती है। सबसे ऊंची और सबसे नीचे की दरों को हटाने के बाद जो औसत बचता है वही लाइबोर है, जो दुनिया में अरबों डॉलर के कर्ज की निर्धारक ब्याज दर है। इन चुनिंदा बडे़ बैंकों की करामात उन बैंकों पर बहुत भारी पड़ी जो खुले बाजार में कर्ज दे रहे थे। खराब वित्तीय सेहत के बावजूद उन्हें सस्ते कर्ज देने पड़े और उन्हें कम रिटर्न मिला। लाइबोर से प्रभावित वित्तीय सौदों का आकार इतना बड़ा है कि दुनिया के इतिहास का हर घोटाला इसके सामने पानी भरेगा। संगठित गिरोह लाइबोर के दिनदहाड़े अपहरण से पूरी दुनिया का बैंकिंग उद्योग थरथरा रहा है। करीब 12 बैंक (जेपी मोर्गन, बार्कलेज, सिटीबैंक, बीएनपी परिबा, एचएसबीसी, बैंक ऑफ टोक्यो, मित्सुबिशी आदि) इस घोटाले में शामिल पाए गए हैं। ब्रिटेन के प्रमुख बैंक बार्कलेज पर 452 अरब डॅालर का जुर्माना लग गया है। नुकसान उठाने वाली दुनिया भर की सरकारें, बैंक और निवेशक बैंकों के खिलाफ भारी मुकदमों की तैयारी कर रहे हैं। यूरोप व अमेरिका के विशेषज्ञ इसे बैंकिंग उद्योग का टोबैको मूमेंट कह रहे हैं। जैसे 1998 में अमेरिकी सिगरेट कंपनियों को मुकदमों में फंसकर 200 अरब डॉलर चुकाने पडे़ थे, ठीक उसी तरह लाइबोर घोटाले में शामिल करीब एक दर्जन बैंकों को भारी हर्जाना चुकाना पड़ेगा। इन बैंकों पर करीब 22 अरब डॉलर की पेनाल्टी लगाने का फैसला पहले ही हो गया है। हर्जानों के मुकदमों की गिनती अब शुरू हो रही है। यह ग्लोबल बैंकिंग का सबसे बुरा चेहरा है। घोटाला खुला तो पता चला कि लाइबोर जैसे प्रमुख ग्लोबल वित्तीय पैमाने कितने तदर्थ ढंग से तय किए जाते हैं। दुनिया में अरबों डॉलर के लेनदेन का बुनियादी पैमाना कोई नियामक संस्था नहीं, बल्कि कारोबारियों की एक समिति (ब्रिटिश बैंकर्स एसो.) तय करती है। अर्थात दुनिया का असली बैंकिंग कारोबार पूरी तरह विनियमन से बाहर है। आम लोगों को हैरत इस बात पर है कि अमेरिकी वित्त मंत्री टिमोथी गेथनर से लेकर बैंक ऑफ इंग्लैंड के प्रमुख मर्विन किंग तक सभी इस चोरी को जानते थे (2008 के ई-मेल), मगर इसे रोकने की कोशिश नहीं हुई। रही बात बैंकों की तो उनके आपराधिक लालच का इतिहास अब बहुत अमीर हो गया है। तेज मुनाफों के लिए वह किसी भी कीमत तक जा सकते हैं। यही वजह है कि जब दुनिया लाइबोर को ब्रह्म वाक्य मानकर ब्याज दरें तय कर रही थी, तब लाइबोर एक्सचेंज पर ब्याज दर दर्ज कराने वाले ट्रेडर एक-दूसरे को यह संदेश (ई-मेल व दस्तावेज) भेज रहे थे कि बॉस कॉम हो गया, हम शाम को पार्टी करेंगे और शैंपेन खोलेंगे। आज अगर लंदन या न्यूयॉर्क की सड़कों पर कोई यह चीखे कि वित्तीय दुनिया चोरों से भरी पड़ी है और दुनिया के शीर्ष पेशेवर दरअसल सबसे बड़े लुटेरे हैं, उस पर भरोसा कर लीजिएगा। वजह यह है कि ग्लोबल बैंकों का लालच अब अपराध में बदल गया है। भारत में माइबोर (मुंबई इंटरबैंक ऑफर्ड रेट) लाइबोर का सहोदर है। लाइबोर घोटाले के बाद माइबोर ही क्यों, यूरीबोर (यूरो इंटरबैंक ऑफर्ड रेट) और टोईबोर (टोक्यो) भी सवालों केघेरे में हैं, क्योंकि लालची बैंक कहीं कुछ कर सकते हैं। पूरी दुनिया बैंकिंग कानूनों में गजब की सख्ती मांग रही है और बैकिंग नियामकों की कमजोरी पर लानते भेज रही है। लाइबोर की दिनदहाडे़ लूट देखने के बाद किसे भरोसा होगा कि विश्र्व का वित्तीय भविष्य इन बैंकरों के हाथ में सुरक्षित है? बात पुरानी है, मगर सही है कि आप किसी को बंदूक दीजिए तो वह बैंक लूटेगा। मगर किसी को एक बैंक दे दीजिए तो वह दुनिया लूट लेगा।.. हमें तो हमारे भरोसे (बैंक यानी भरोसा) ने ही लूट लिया है।

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