Wednesday, August 1, 2012

शासन के अंधेरे में डूबी जनता

विडंबना कहें या देश के साथ क्रूर मजाक कि जिन सुशील शिंदे के समय ऊर्जा मंत्रालय शक्तिहीन हो गया उन्हें अब देश की आंतरिक सुरक्षा का प्रभार यानी गृह मंत्रालय सौंप दिया गया। यदि सब कुछ कांग्रेस नेतृत्व की योजना के मुताबिक हुआ तो वह लोकसभा में सदन के नेता भी होंगे। जिस ऊर्जा मंत्रालय में सबसे ज्यादा सुधार की जरूरत है उसे कॉरपोरेट मंत्री वीरप्पा मोइली को अतिरिक्त प्रभार के तौर पर सौंपा जा रहा है। मनमोहन सरकार में बुनियादी क्षेत्र से जुड़े मंत्रालय तदर्थवाद पर ही चल रहे हैं। गठबंधन की मजबूरी है कि देश को मुकुल रॉय के रूप में ऐसा मंत्री मिला है जिसकी पूरी ऊर्जा रेल मंत्रालय चलाने में नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी को खुश रखने में लगती है। सड़क-परिवहन मंत्रालय बेमन सीपी जोशी संभाल रहे हैं, जिनका दिल-दिमाग राजस्थान की सीमा ही नहीं पार कर पाता। आर्थिक लिहाज से सबसे क्षमतावान दूरसंचार मंत्रालय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल तदर्थ तौर पर संभाल रहे हैं। प्रणब मुखर्जी के इस्तीफे के एक माह बाद वित्त मंत्रालय को पी चिदंबरम के रूप में नए मंत्री मिले हैं, जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विपक्ष समेत सिविल सोसाइटी के निशाने पर हैं। केंद्र में सिर्फ राजनीति चल रही है, सरकार तो कतई नहीं। देश जबरदस्त महंगाई की चपेट में है। सात राज्यों को केंद्र सरकार पहले ही सूखाग्रस्त मान चुकी है। पिछले 48 घंटों के दौरान उत्तरी ग्रिड, पूर्वी ग्रिड और उत्तर-पूर्वी ग्रिड ठप हो चुके हैं। दो-तिहाई देश अंधेरे में है और चौतरफा अफरा-तफरी है। यह अंधेरा सरकार की नीतिगत शून्यता और क्षुद्र सियासी हितों की मानसिकता से पैदा हुआ है। इसका ज्वलंत उदाहरण है मंगलवार को बुलाई गई अधिकार प्राप्त मंत्रिमंडलीय समूह की बैठक में ऊर्जा मंत्री की हैसियत से शामिल सुशील कुमार शिंदे का बर्ताव। सूखे पर बुलाई गई इस बैठक में शिंदे सूखे से निपटने में अपने मंत्रालय की कार्ययोजना ले जाने के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र शोलापुर की एक समस्या लेकर शामिल हुए। इस पर समूह के अध्यक्ष और कृषि मंत्री शरद पवार ने शिंदे की चुटकी भी ली। तथ्य यह भी है कि सरकार के पास महंगाई से लेकर अन्य समस्याओं से निपटने का कोई फार्मूला नहीं है। जो फैसले वह लेना चाहती है वह सियासी मजबूरी और सहयोगियों की घुड़की के कारण लेने में असमर्थ है। जिस तरह से सरकार चल रही है और जैसे सियासी हालात हैं उससे आठ अगस्त से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र भी बेहद हंगामी होना तय है। ऐसे में प्रधानमंत्री और सरकार चाहे जो कहें, रिटेल व पेंशन में एफडीआइ और बीमा व नागरिक उड्डयन में एफडीआइ सीमा बढ़ाने या भूमि अधिग्रहण जैसे फैसले इस सत्र में भी पारित होने के लक्षण नहीं हैं। इस सरकार की हालत यह है कि 19 सांसदों वाली ममता से लेकर नौ सांसदों वाले शरद पवार तक उसे अपनी अंगुलियों पर नचाते हैं। मायावती और मुलायम जैसे बाहर से समर्थन दे रहे दल भी हर कदम पर साथ चलने की कीमत वसूल रहे हैं। गृह मंत्री घोषित होने के दो घंटे पहले तक ऊर्जा मंत्री शिंदे बिजली संकट के लिए कुछ राज्यों पर तोहमत मढ़ रहे थे, लेकिन यह समस्या एक दिन में पैदा नहीं हुई। शिंदे व ऊर्जा मंत्रालय सब जान रहे थे कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब अपने कोटे से अधिक बिजली ग्रिड से उठा रहे हैं। ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें क्यों नहीं चेताया, इसका शिंदे के पास कोई जवाब नहीं। सियासी मजबूरी का वह जवाब दें भी तो कैसे कि उत्तर प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार कुछ कह भी नहीं सकती। हरियाणा और राजस्थान तो खुद कांग्रेसशासित ही हैं। उन्हें रोकने का साहस यदि पहले किया गया होता तो दो-तिहाई भारत इस तरह बिजली संकट से न जूझता। मामूली मंत्रिमंडलीय फेरबदल भी सरकार की विकल्पहीनता और कमजोर इच्छाशक्ति को प्रमाणित करता है।

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