Monday, July 23, 2012
कोयला खदानों में मचल रहीं मछलियां
धनबाद जहां की खदानें कोयला उगलती हैं वहां मछलियां निकलने लगें तो..। जी हां, देश की कोयला राजधानी धनबाद में मछली क्रांति की शुरुआत हो चुकी है। झारखंड ऐसा पहला राज्य है जहां बंद पड़ी खुली कोयला खदानों में मछली पालन प्रयोग सफल हुआ है। आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में धनबाद समेत राज्य की सैकड़ों बंद पड़ी बड़ी-बड़ी खदानों में यही प्रयोग होने पर झारखंड मछली पालन में आंध्रप्रदेश को टक्कर देने लगे। खुली खदानों में लबालब पानी मछली पालकों के लिए बड़ा सहारा है। राज्य सरकार की पहल : मछली उत्पादन में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने व बंद खदानों के पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए राज्य सरकार ने नवंबर 2011 में धनबाद की कई कोयला खदानों में मछली की जीरा डलवाया था। मत्स्य विभाग ने बीसीसीएल, ईसीएल, सेल आदि की लगभग 230 बंद खदानों की बंदोबस्ती की योजना बनाई। पहले चरण में 88 खदानों की बंदोबस्ती तीन वर्ष के लिए की गई। सुखद आश्चर्य- आठ माह में एक खदान से करीब 10 क्विंटल मछलियां निकली। मछलियों की स्थिति : आशंका थी कि इन खदानों में पलनेवाली मछलियां जहरीली न हों, लेकिन ये निर्मूल साबित हुई। निरसा काली माटी खदान की बंदोबस्ती लेने वाले राम प्रवेश राजभर ने बताया कि उनके तालाब में एक किलो से 10 किलो वजन वाली मछलियां हैं। अब तक नौ क्विंटल मछली पकड़ चुके हैं। 27 नंबर हडि़याजाम खदान, भमाल खदान आदि के बंदोबस्ती धारकों का भी ऐसा ही मानना है। प्रभावित करती है गहराई : मछली पालकों की मानें तो खदानों की गहराई 20 फुट से अधिक होने से उत्पादन प्रभावित होता है। अमूमन ऐसी खदानों की गहराई 70 से 100 फीट के आसपास होती है जिससे बड़ा से बड़ा जाल भी तल तक नहीं पहुंच पाता। मछली पकड़ने और उसके पालन को उन्नत और आधुनिक तकनीक जरूरी है। विभाग से मछली जीरा या फिंगर लिंग प्राप्त हो जाता है, लेकिन नाव, बड़ी जाल जैसे अन्य संसाधनों की कमी खलती है। सरकार मदद करे तो वे आंध्रप्रदेश को मात दे सकते हैं।
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