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Saturday, August 11, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                       बोझ नहीं, जिम्मेदारी हैं बुजुर्ग

एक बांग्लादेशी लोककथा है कि एक पुत्र अपने उम्रदराज लाचार पिता को टोकरे में बिठाकर जंगल में छोडऩे के लिए जा रहा था। यह देखकर बुजुर्ग का पोता अपने पिता से कहता है, 'पिताजी, यह टोकरा जरूर वापस ले आएं। जब आप बूढ़े हो जाएंगे, तो मुझे इसकी जरूरत पड़ेगी।' कुछ अरसा पहले दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में तीन हजार वृद्ध महिला-पुरुष जुटे। उनकी मांग थी कि सभी बुजुर्गों के लिए एक समान पेंशन का प्रावधान किया जाए, जो उनके सक्षम होने की दशा में मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी-वेतन के आधे से कम न हो। फिलहाल भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 60 बरस से अधिक आयु के सभी लोगों को 400 रुपए मासिक पेंशन का प्रावधान है। राज्य सरकारों ने इस राशि में अपने-अपने हिसाब से योगदान किया है। 



फिलहाल यह नाममात्र की सरकारी पेंशन ज्यादातर राज्यों में चार से आठ दिनों की वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के बराबर ही है, जो सम्मानजनक जीवन के लिहाज से बेहद कम है। अधिकांश राज्यों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के चलते यह मामूली धनराशि भी जरूरतमंद बुजुर्गों तक समय से नहीं पहुंच पाती। बावजूद इसके हमारे अध्ययन दिखाते हैं कि जब यह पेंशन वंचित बुजुर्गों तक पहुंचती है, तो उनके लिए संजीवनी के मानिंद होती है। 
नियमित सेक्टर में वृद्धावस्था एक समुचित पेंशन के आधार पर आराम से जीवन गुजारने का वक्त होती है। यह पेंशन उस शख्स की सेवानिवृत्ति के समय मिल रहे वेतन का अमूमन आधा होती है। परंतु यह ज्यादातर वृद्धों के लिए महज एक स्वप्न है, क्योंकि अनियमित सेक्टर में कुछ ही सामाजिक सुरक्षा योजनाएं होती हैं। इसलिए अधिकांश गरीब बुजुर्ग जोड़ों, सांस और नजर की दिक्कतों के बावजूद काम खोजने पर मजबूर होते हैं। 2004-05 में एनएसएसओ का आकलन था कि भारत में लगभग 3.7 करोड़ बुजुर्ग उत्पादक कार्यों से जुड़े हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक होगा। अधिकांश मनरेगा कार्यस्थलों पर मैंने काफी संख्या में अधेड़ या बुजुर्गों को कठोर शारीरिक श्रम से जूझते पाया है। 
संयुक्त परिवार और संपत्ति पर साझा हक व्यवस्था में दरारें पडऩे, शहरों की ओर पलायन, नगरों में जगह की कमी और वैकल्पिक व्यक्तिपरक सांस्कृतिक कायदों ने मिलकर परिवार द्वारा बुजुर्गों की देखभाल करने की प्रवृत्ति को गहरा नुकसान पहुंचाया है। संयुक्त परिवारों की टूटन, अकेलापन और शारीरिक व भावनात्मक सहारे की कमी जैसे कारक उनके सम्मानजनक तरीके से जीवन बिताने की मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं। पहले गांवों के जरूरतमंद मर्द कमाने-खाने के लिए अकेले ही बाहर जाते थे और बुजुर्गों को अपनी पत्नी व बच्चों के साथ छोड़ जाते थे। अब वे अपने बीवी-बच्चों को साथ लेकर निकल जाते हैं और अपने बुजुर्गों को भीख मांगकर गुजारा करने या मरने के लिए छोड़ जाते हैं। 

यूएनपीएफ के एक आकलन के मुताबिक देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में तकरीबन २० फीसदी बुजुर्ग अकेले या सिर्फ अपने जीवनसाथी के सहारे जीवन काटने को विवश हैं। तमिलनाडु में यह तादाद तो 45 फीसदी तक जा पहुंची है, जबकि गोवा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी यह दर काफी ज्यादा है। 

फिलहाल पेंशन की जो सरकारी व्यवस्था है, वह बेहद मामूली है और चुनिंदा लोगों तक ही पहुंच पाती है। विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं, 'गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की जनगणना हर बार लापरवाही से किया जाने वाला काम बन ही जाती है।' वे यह भी जोड़ते हैं कि तुलनात्मक रूप से संपन्न घरों में भी बुजुर्गों की गंभीर अनदेखी हो सकती है। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की पहचान बेहद मुश्किल तो है ही, साथ ही यह जांचना भी काफी कठिन होता है कि परिवार के भीतर संसाधनों का वितरण किस तरह से होता है। इन तमाम वजहों के चलते समान सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ एक समान पेंशन का होना जरूरी है। बुजुर्गों के साथ-साथ अन्य अभावग्रस्त समूहों को भी इन दोनों योजनाओं की बेहद जरूरत है। 
औपचारिक पेंशन योजनाओं के दायरे में आने वाले और आयकर देने वाले बुजुर्गों को छोड़कर बाकी सभी बुजुर्गों के लिए एक समान पेंशन की मांग पर त्वरित प्रतिक्रिया यही होती है कि यह अव्यावहारिक मांग है, जिसे माना नहीं जा सकता और देश इस तरह की पेंशन का 'बोझ' नहीं वहन कर सकेगा। यह दिलचस्प है कि सार्वजनिक नीति में बुढ़ापे के लिए ज्यादातर संदर्भों के पहले आज 'बोझ' शब्द जुड़ा होता है। हम उस संस्कृति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं, जो बुजुर्गों को ज्ञान और अनुभव के भंडार के रूप में मान देत थी और किसी मामले में उपयोगी मशविरा लेने व युवाओं को सामाजिकता का पाठ पढ़ाने के लिए उनकी ओर देखती थी। आर्थिक विकास के प्रति जुनून के इस दौर में लोगों का मूल्यांकन मुख्यत: उत्पादकों व उपभोक्ताओं के रूप में होता है। इसीलिए अब बुजुर्गों को आदर के योग्य नहीं समझा जाता। 
'अनुत्पादक' बुजुर्गों की खातिर किसी भी तरह का सार्वजनिक खर्च सरकारी खजाने में निकास की तरह देखा जाता है। सामाजिक सुरक्षा को विस्तार देने की हर सरकारी कोशिश की यह कहकर आलोचना की जाती है कि इससे विकास की रफ्तार सुस्त हो जाएगी। बीमारी की तरह बुजुर्गों को भी अमूमन हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज और यहां तक उन परिवारों द्वारा भी बोझ समझा जाता है, जिसे उन्होंने बड़ा किया और जिससे वे जुड़े हैं। नोम चोम्स्की कहते हैं : 'सामाजिक सुरक्षा इस धारणा पर आधारित है कि हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं और हमारी यह सामुदायिक जिम्मेदारी है कि हम उन लोगों की देखभाल करें, जो अपनी देखभाल खुद नहीं कर सकते, चाहे फिर वे बच्चे हों या बुजुर्ग।'
जाहिर तौर पर एक समान पेंशन की मद में हमें खासा खर्च करना होगा। यदि हम देश के नब्बे फीसदी बुजुर्गों को कवर करते हुए उन्हें मासिक 2,000 रुपए की पेंशन दें तो इस पर सार्वजनिक धन का सालाना 1,92,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। देशवासियों को तय करना होगा कि क्या यह वहन न किया जाने लायक बोझ है या फिर बुजुर्गों का लंबे समय से उपेक्षित कर्ज है, जिसे अब और चुकाए बिना नहीं रहना चाहिए? 

Thursday, August 2, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                               चलें अपने सपनों की राह 



मैंने साठ के दशक में अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया, जो उस वक्त वहां का सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान था या कहें कि अब भी है। बहरहाल, मैं एक नेशनल साइंस स्कॉलर था। हालांकि मुझे साइंस पढऩा जरा भी नहीं सुहाता था, इसके बावजूद इसमें दाखिला लेने की एक वजह यह थी कि मुझे कॉलेज में इसी के जरिए छात्रवृत्ति मिल सकती थी। मुझे छात्रवृत्ति के तहत मासिक तौर पर पचास रुपए मिलते थे। हालांकि आज के हिसाब से यह बहुत छोटी रकम लगती है, लेकिन उस वक्त यह मेरे लिए बहुत मायने रखती थी। मेरी उम्र उस वक्त सोलह साल की रही होगी और मेरे माता-पिता रिटायर्ड स्कूली शिक्षक/शिक्षिका थे। 


जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था, उसी दौरान नक्सलवादी आंदोलन शुरू हो गया। इस आंदोलन के प्रभाव से हमारा प्रेसीडेंसी कॉलेज भी अछूता नहीं रहा। कॉलेज के मेरे कई संगी-साथी चुपचाप एक ऐसी लड़ाई लडऩे के लिए निकल पड़े, जिसके बारे में संभवत: उन्हें भी लगता होगा कि वे कभी नहीं जीत सकते। हालांकि मैं कोई माक्र्सवादी नहीं हूं, लेकिन कहीं न कहीं मुझे भी यह लगा कि उनका दिल सही जगह पर था। वे आदर्शवाद के दिन थे। उन दिनों कोई भी कॅरियर व वेतन-पारिश्रमिक इत्यादि की बात नहीं करता था। हमारे मन-मस्तिष्क पर उन दिनों चे ग्वेरा छाए हुए थे। हम वियतनाम की बातें करते थे। हम हर तरीके की जंग लडऩा और जीतना चाहते थे। 


यही वह दौर था, जब मुझे कविताएं लिखने का चस्का लगा। मेरे मन में लेखक बनने की धुन सवार थी। लिहाजा एक दिन मैंने कॉलेज बंक किया और उस जॉब के लिए इंटरव्यू देने पहुंच गया, जिसका विज्ञापन मैंने कुछ दिनों पहले पढ़ा था। इसकी अगली सुबह मैं बैंटिक स्ट्रीट पर एक दिहाड़ी नौकरी कर रहा था। मैंने इस जॉब को इसलिए चुना क्योंकि इससे मुझे रात में लिखने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता था। इसके साथ ही मेरे कॉलेज की पढ़ाई के दिन पूरे हो गए। लेकिन मेरा यकीन मानिए, मैंने इसे एक पल के लिए भी मिस नहीं किया। अलबत्ता मेरा तो यह मानना है कि यह संभवत: मेरे द्वारा अब तक लिया गया सर्वाधिक समझदारीपूर्ण निर्णय था। मैंने खूब लिखा, तस्वीरें खींचीं और दूसरोंं के लिए कुछ सामग्री वगैरह भी तैयार की। इतना ही नहीं, मैंने अपनी २२५ रुपए मासिक तनख्वाह में से कुछ रुपए बचाकर एक सामयिक काव्य पत्रिका शुरू की, जिसमें मैं देश के चुनिंदा बेहतरीन लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करता था। ऐसा करने वाला मैं अकेला नहीं था। मेरे समकालीन कई लोग इसी तरह कुछ न कुछ रोमांचक काम कर रहे थे। वे बगैर किसी सुरक्षा जाल के जिंदगी के इस मैदान में कूद पड़े और उन सभी ने बहुत अच्छा काम किया। 


आज मैं जहां पर भी हूं, वहां तक सिर्फ इसलिए पहुंच पाया क्योंकि उस वक्त मैंने अपने दिल की आवाज सुनी और कॉलेज को त्यागते हुए उस काम को चुना, जो मैं वास्तव में करना चाहता था। हालांकि मुझे प्रेसीडेंसी कॉलेज और वहां के अपने मित्रों से लगाव था, लेकिन अपनी आजादी इससे भी ज्यादा प्यारी थी और इसने मुझे जिंदगी में एक ऐसी शुरुआत दी, जिससे मैं अलग तरह के सपने देख व उन्हें पूरा कर पाया। अकादमिक्स के साथ इस बे्रक ने मुझे अपने अतीत से भी विलग होने के लिए मजबूर कर दिया। अब मैं अपनी उम्मीद से कहीं अधिक जोखिम उठाने के लिए तैयार था। 


यही कारण है कि जर्मन मूल के अमेरिकी उद्यमी और 'पेपल' के सह-संस्थापक पीटर थिएल ने जो किया, उसकी मैं दिल से सराहना करता हूं। पीटर ने एक ऐसा फाउंडेशन बनाया है, जो अकादमिक उत्कृष्टता को पुरस्कृत करने (जैसा कि ज्यादातर फाउंडेशन करते हैं) के बजाय इसके ठीक उलट काम को प्रोत्साहित करता है। यह बीस साल से कम उम्र के युवाओं को कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर अपने सपनों को पूरा करने की राह पर निकलने के लिए प्रेरित करता है। इसके लिए थिएल ने फेलोशिप कार्यक्रम चलाया है, जो इन युवाओं को दुनिया बदलने वाले स्वप्नद्रष्टा बनने के लिए १,00,000 डॉलर देता है। यह फेलोशिप कार्यक्रम युवाओं को यह मौका देता है कि वे अकादमिक्स के चंगुल से छूटकर और सिस्टम से बाहर निकलते हुए अपने सृजनात्मक और उद्यमशीलता की समझ के साथ बगैर समय गंवाए आगे निकल पड़ें। 


थिएल ऐसे युवाओं से सिर्फ दो चीजों की उम्मीद करते हैं। पहली, वे नजर बचाकर कोई अंशकालिक कोर्स न करें। दूसरी, उन्हें अपने सपनों को साकार करने के लिए पूरे समय काम करना होगा। थिएल का मानना है कि इतनी कम उम्र में सीखने की बंधी-बंधाई परंपरा से मुक्त युवाओं की पूर्ण एकाग्रता विभिन्न क्षेत्रों में ए-नए विचारों को प्रोत्साहित करेगी, जिससे आखिरकार हमारे जीवन में भी बदलाव आएगा। हर क्षेत्र स्मार्ट, स्वस्फूर्त और नई सोच रखने वाले नए युवाओं से लाभान्वित हो सकता है। औपचारिक शिक्षा को लांघते हुए ये युवा उस तरह से सोच सकेंगे, जैसा वे सोचना चाहते हैं। न कि वे उस तरह सोचेंगे, जैसा हम उनसे उम्मीद करते हैं। 


मेरा मानना है कि हमारे यहां भी कुछ फाउंडेशन संस्थाओं को ऐसा करना चाहिए। हमारे यहां नौकरियों की गलाकाट स्पद्र्धा की तरह अकादमिक चूहा दौड़ भी लोगों की आत्मा को मार रही है। इसे बढ़ावा देने के बजाय ये फाउंडेशन युवाओं को अपना विशिष्ट हुनर, विशिष्ट व्यक्तित्व खोजने की दिशा में प्रोत्साहित कर सकते हैं। इस तरह की फेलोशिप उनके लिए काफी सुकूनदायक हो सकती है, जिससे वे अपने उन विचारों पर ध्यान लगा सकेंगे, जिन पर वे वास्तव में काम करना और जिन्हें फलीभूत होते देखना चाहते हैं। जॉब मार्केट लगातार सिकुड़ रहा है। ऐसे में इस तरह के प्रयासों से उद्यमिता व प्रयोगधर्मिता का नया दौर शुरू हो सकता है और युवाओं को एक त्वरित शुरुआत मिल सकती है। यह शुरुआत माउंट किलिमंजारो पर चढ़ाई करने, कोई वाद्ययंत्र सीखने या फिर मेरी तरह कोई किताब या कविता लिखने की तरह कुछ भी हो सकती है। आइडिया कुछ नई शुरुआत करने का होना चाहिए। बाकी चीजें अपने आप ठीक हो जाएंगी। 


कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज की स्थापना वर्ष १८१७ में की गई थी। तब इसका नाम 'हिंदू कॉलेज' रखा गया था। 
वर्ष १८५५ में इसका नाम 'प्रेसीडेंसी कॉलेज' कर दिया गया और वर्ष २०१० में इसे यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला। 

Wednesday, August 1, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                       टूटी खिड़कियों वाला इलाका 



देश का कोई इलाका किस तरह क्रमश: खतरनाक आपराधिक गतिविधियों का अड्डा बन जाता है? इस बाबत अस्सी के दशक में अमेरिका के दो समाजशास्त्रियों जेम्स क्यू विलसन और जॉर्ज एल केलिंग ने टूटी खिड़कियों (दि ब्रोकन विंडोज) नामक एक नायाब थ्योरी पेश की थी। उनके अनुसार बड़ी अराजकता की शुरुआत अक्सर एक टूटी खिड़की करती है। सड़क से दिखती उपेक्षित मकान की वह खिड़की आवारागर्दों को उसके बाकी खिड़की दरवाजों में भी तोडफ़ोड़ करने को उकसाती है। अगर फिर भी कोई हरकत नहीं होती, तो आपराधिक तत्व दरवाजे तोड़कर लावारिस घर के भीतर स्थायी पैठ बना लेते हैं और घर उनके तमाम आपराधिक कामों का अवैध अड्डा बन बैठता है। इस बिंदु पर पुलिस प्रशासन हरकत में आए भी तो उसे आजमूदा तरीकों से सहज पटा लिया जाता है और फिर तो अघोषित प्रशासकीय अनदेखी तले दूसरे अपराधी गुटों की भी वहां आवाजाही होने लगती है। अंतत: शरीफ लोग तो मजबूरी में उस बदनाम और खतरनाक इलाके से भागने लगते हैं और इलाका अवैध माल से लेकर जबरिया कब्जे या चुनावी लड़ाई में काम आने वाले बाहुबली तक का बिक्री केंद्र बन जाता है। 


आज भले ही असम के मुख्यमंत्री केंद्र को, केंद्र सेना को और सेना सुस्त केंद्रीय बाबूशाही को दोष दे रहे हों, लेकिन वहां भी यही हुआ है। आजादी के बाद अविभाजित पूर्वोत्तर में पहली खिड़की साठ के दशक में तोड़ी गई थी जब असमिया को पूरे इलाके की सरकारी भाषा बनाने के प्रस्ताव पर ब्रह्मपुत्र की घाटी में मैदानी और पहाड़ी मूल के कबीलों में हिंसक टकराव के दौरान हजारों मीजो विद्रोहियों ने लुशाई पहाडिय़ों में स्थिति इतनी विस्फोटक बना दी कि बीबीसी रेडियो पर घोषणा हो गई कि मीजो जिला भारत से अलग हो गया है। इसके बाद भी सख्ती के बजाय अनिर्णय और खोखली पुचकार में कई साल गुजर गए। इस दौरान इलाके में एक उग्र अलगाववादी मीजो मोर्चा बना, जिसने 1966 में भारत, बर्मा (म्यांमार) और पूर्वी पाकिस्तान के मीजो इलाकों को मिलाकर एक स्वाधीन क्षेत्र बनाने की मांग बुलंद कर दी। अंततोगत्वा जब तक हजारहां समस्याएं विमोचित करते हुए देश का भाषायी आधार पर पुनर्गठन किया गया, तब तक कई खिड़कियां टूट चुकी थीं और उग्र क्षेत्रीयता व अलगाववाद की समस्या इलाके में पैठ बना चुकी थी। इस बीच इलाके की दशा में दो और जटिल मोड़ आए। 1965 का भारत-पाक युद्ध और 1971 में बांग्लादेश का जन्म। 1971 के दौरान भारत-बांग्लादेश सीमापार से आए लाखों शरणार्थियों ने असम के ग्वालपाडा, धुबरी और कोकराझार इलाकों के अलावा त्रिपुरा तथा मेघालय में भी भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक जमीन और स्कूली इमारतों में बनाए शरणार्थी शिविरों में पनाह ली। इनमें मुसलमानों के अलावा बांग्लादेशी हिंदू, सिख और बौद्ध समुदायों के लोग भी थे। युद्ध की समाप्ति के बाद उनका एक बड़ा हिस्सा वायदे के मुताबिक वापस नहीं लौटा। लोग लगातार सीमापार से सुरक्षा बलों को चकमा या घूस देकर इलाके में आते गए और वोट बैंक के दबावों के तहत नागरिक बनकर सार्वजनिक जमीन, वनों तथा उपेक्षित सार्वजनिक भवनों में खेत-घर बनाने लगे। इन संदिग्ध नागरिकों की धरपकड़ और वापसी की व्यवस्था के बजाय राजनीतिक दल उनकी उपस्थिति का लाभ अल्पसंख्यक वोट बैंक पुष्ट करने या फिर स्थानीय जनजातियों में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काकर बहुसंख्यकों के पार्टी विशेष के पक्ष में ध्रुवीकरण को करने लगे। शह पाकर सीमापार से हथियारों, ड्रग्स और आतंकियों की अनधिकृत आवाजाही बढ़ी, साथ ही पूरी पूर्वोत्तरी सीमा में सार्वजनिक जमीन, जंगल और भवन भी अवैध अतिक्रमण का शिकार होते रहे। इस सबसे बेहद नाजुक और लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर असुरक्षित वैध स्थानीय निवासियों, कबीलों और अवैध आपराधिक घुसपैठियों के बीच तनातनी खतरनाक हद तक बढ़ती चली गई। आगे इसी क्रम में हथियारबंद नगा मणिपुर में और बोडो असम में अपनी स्वायत्तता की मांग लेकर आंदोलित हुए। 


2003 में बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्तता परिषद बनने तक परिदृश्य में अनेक बाहरी आव्रजक इलाके में आ बसे थे और स्थानीय आबादी का प्रतिशत घटने तथा उग्रवादी बोडो दस्तों की हथियारबंदी न घटने से भीतरी तथा बाहरी सभी गुट असुरक्षित महसूस करने लगे थे। जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के मामले भी लगातार बढ़ रहे थे (सिर्फ 2008 में जमीन विवाद में यहां 55 मौतेंहुईं)। 2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार असम के 27 जिलों में से 11 मुस्लिमबहुल जिलों में स्थानीय मूल के लोग अल्पसंख्यक बन गए हैं। उधर चुनाव आयोग ने भी इस इलाके में पिछले चुनावों में 1.5 लाख मतदाताओं की वैधता संदिग्ध पाई। फिर भी ये हिंसक वारदातें और क्षेत्रीय आबादी में बदलाव दिखाने वाले चुनाव आयोग तथा जनगणना आंकड़ों के साक्ष्य गंभीरता से नहीं पढ़े गए। चुनाव-दर-चुनाव क्षुद्र दलगत स्वार्थों के चलते धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के नाम पर लगातार अशांति फैलाने वालों के खतरनाक अड्डों को मौन उकसावा मिला और तिस पर संदिग्ध नागरिकता, आतंकी तत्वों की अवैध घुसपैठ और तस्करी के कुल 4 लाख संगीन मामले भी न्यायिक और प्रशासनिक सुस्ती से अनिर्णीत रहते आए। असम में ताजा हिंसा इन्हीं सबका मिलाजुला नतीजा है। 


अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका द्वारा असम से अवैध आव्रजकों को हटाने पर बने 1950 के कानून के हवाले से कहा गया है कि न्यायालय तथा राज्य सरकार 25 मार्च 1971 के बाद से राजनैतिक, धार्मिक या नागरिक उत्पीडऩ के शिकार बनकर भारत आए शरणार्थियों की पुख्ता पहचान करके उनको इस कानून में दिया सुरक्षा का वादा निभाए और शेष को वापस भेजे। पर आज की हिंसा की वजह सिर्फ अवैध घुसपैठ का दबाव नहीं। असम में भी शेष देश की तरह आबादी लगातार बढऩे से जमीन की किल्लत हो चली है और पुराने उग्रवादी बोडो दस्ते निरस्त्र नहीं किए गए। लिहाजा अब हर धर्म, जाति, जनजाति के लोगों ने वहां अपनी जमीन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए हथियारों से लैस अवैध दस्ते बना लिए हैं। ताजा झड़प से पहले वहां संथाल और बोडो भिड़ चुके हैं। इलाके की मिलीजुली आबादी में स्थानीय हिंदू बनाम बांग्लादेशी व नेपाली मूल के हिंदू बनाम मुसलमान के बीच ही नहीं, स्थानीय बोडो और बाहरी देशों (म्यांमार, बांग्लादेश) से आए बोडो गुटों के बीच भी बुआई के पहले खूनी दंगे हुए हैं। यह सारा इतिहास नए दंगों को शह दे रहा है। सिर्फ दो छात्र नेताओं की मौत या सेना के आने में चंद दिन की देरी से इतनी व्यापक हिंसा नहीं उपज सकती। 


असम में दो दर्जन से ज्यादा आदिवासी समूह रहते हैं, जिनमें से कइयों की अपनी भाषा, नृत्य शैली व परंपराएं हैं। 
रामायण, महाभारत व पुराण इत्यादि ग्रंथों में इस राज्य का 'प्रागज्योतिष' के नाम से उल्लेख मिलता है।

Saturday, July 28, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                              बर्बाद वक्त का लेखा-जोखा


मैं ९८ साल का हो चुका हूं। इस उम्र में अक्सर लोग बैठे-ठाले अपनी पिछली जिंदगी को याद करते रहते हैं और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। मैं अक्सर सोचता हूं कि आखिर मैंने वर्ग-पहेलियां सुलझाने में अपने जीवन का कितना कीमती वक्त जाया कर दिया। मेरे घर में रोज पांच अखबार आते हैं और इन सबमें वर्ग-पहेलियों के कॉलम भी होते हैं। मुझे वर्ग-पहेलियों का जबरदस्त चस्का लगा है और मैं न्यूज हेडलाइंस पर सरसरी निगाह दौड़ाने के बाद इन वर्ग-पहेलियों को हल करने में जुट जाता हूं। इन वर्ग-पहेलियों को भरते-भरते सुबह से दोपहर हो जाती है और तब मैं अपने मध्याह्न भोजन के लिए उठ जाता हूं। कई बार तो मैं दुपहरी में थोड़ी-देर आराम फरमाने के बाद पुन: इन वर्ग-पहेलियों में उलझ जाता हूं। इनके अलावा मुझे कुछ सूझता ही नहीं। अब जाकर मुझे लगता है कि मैंने अपनी जिंदगी के कई साल समय गुजारने के एक ऐसे शगल के चक्कर में बर्बाद कर दिए, जिससे मुझे कोई फायदा नहीं हुआ। मैं तो एक मूढ़मति बुजुर्ग हूं, जो जिंदगी के असल मकसद को नहीं समझता। अब तो मैं सिर्फ इतना ही कर सकता हूं कि अपने पाठकों को चेताऊं कि वे मेरे रास्ते पर न चलें। आखिर जिंदगी को यूं ही समय गुजारने की निरर्थक कवायद में बर्बाद नहीं किया जा सकता। 
मैं तीन महीने की अल्पावधि के लिए शांति-निकेतन में रहा। वहां पर एक पारसी लड़की से मेरी मुलाकात हुई, जिसका नाम था- मेहेर। जल्द ही हमारी अच्छी पटने लगी। उससे मेरी दोस्ती का प्रमुख कारण यह था कि हम दोनों ही बांग्ला नहीं बोल पाते थे। कुछ दिनों बाद मैं लाहौर में अपने कॉलेज वापस आ गया, लेकिन पत्रों के जरिए हमारा संपर्क बना रहा। कुछ समय बाद मेहेर की शादी हो गई और वह मेहेर जस्सावाला बन गईं। इसके साथ ही हमारे पत्र-व्यवहार का सिलसिला भी खत्म हो गया। मैं तकरीबन नौ वर्षों तक 'द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया' का संपादक रहा। इस दौरान मैंने मेहेर के सुपुत्र आदिल जस्सावाला की अनेक कविताएं अखबार में प्रकाशित कीं। 


आदिल बॉम्बे (अब मुंबई)के कैथेड्रल स्कूल में पढ़ाई करने के बाद लंदन चले गए और ऑक्सफोर्ड के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला ले लिया। इसके बाद वह लंदन में स्थित इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने लगे। वर्ष १९७० में वह वापस बॉम्बे लौट आए। यहां आकर उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दीं। अब तक उनके आठ संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। मैंने अपने द्वारा संपादित जर्नल में उनकी अनेक कविताओं को प्रकाशित किया है। कुछ समय पूर्व उनकी नई किताब बाजार में आई- 'ट्राइंग टू से गुडबॉय', जिसे आलमोस्ट आइलैंड बुक्स ने प्रकाशित किया है। बहरहाल, उनकी एक कविता यहां पेश है :- 


मैं यह सोचते हुए ऊपर बढ़ा, 


कि मैं नहीं हूं दूसरों के जैसा। 


लेकिन देख सकते हैं आप, 


कि मैं हूं बिल्कुल ही वैसा। 


तमाम घरौंदों की है एक जैसी दशा। 


हमें खड़ा करने के लिए, 


तुम बनाते हो जो योजनाएं। 


वे सबसे पहले छूती हैं, 


हमारी नींव को। 


अजनबी लोग, 


अभी भी तलाश रहे हैं आशियाना। 


मैं भी रहा हूं महीनों तक, 


उनकी निगाहों का निशाना। 


बहरहाल, 


मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं आजाद। 


मेरा चाहे जो भी हो, 


तुम्हारा भविष्य क्यों हो बर्बाद। 


तुम्हारा ब्रह्मांड बनाया गया, 


एक पिन पर थिरकने। 


और मेरा रचा गया, 


हर हाल में स्थिर रहने। 


कहो अपने गुरु से यह जाकर। 


स्थिरता बसती है देखो, 


घरौंदे में आकर। 


..................................................... 


फाइनेंशियल मैनेजमेंट : 


संता को सड़क पर टहलते हुए १०० रुपए का एक नोट मिला। उसने तुरंत उसे जेब के हवाले किया और सोचने लगा कि इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाए। यह सोचकर वह एक फाइव स्टार होटल में पहुंचा और तमाम लजीज व्यंजनों समेत ड्रिंक्स का भी भरपूर लुत्फ उठाया। आखिरकार वेटर बिल लेकर आया, जो तकरीबन साढ़े चार हजार रुपए का था। 


लेकिन संता ने बिल को देखा तक नहीं और जब से १०० रुपए का नोट निकालकर वेटर के हाथ में थमाते हुए बोला, 'जा काका, ऐश कर।' थोड़ी देर बार वेटर चार मुस्टंडे मार्शलों के साथ वापस लौटा और १०० रुपए का नोट संता के मुंह पर दे मारा। तब तक संता पूरी तरह 'टल्ली' हो चुका था और उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। आखिरकार मैनेजर ने पुलिस बुलाकर उसे गिरफ्तार करवा दिया। थाने पहुंचकर संता ने वही १०० रुपए का नोट पुलिस को दिया और एक घंटे के भीतर उसे उसके घर पहुंचा दिया गया। बाद में संता बंता के समक्ष डींग हांकते हुए बोला - 'वेख्या साड्डा फाइनेंशियल मैनेजमेंट!' 



(सौजन्य : मदन गुप्ता, चंडीगढ़) 




वर्ग-पहेलियों के चक्कर में 


मैं अखबार में न्यूज हेडलाइंस पर निगाह दौड़ाने के बाद वर्ग-पहेलियों को हल करने में जुट जाता हूं। आज सोचता हूं कि मैंने अपनी जिंदगी का कितना कीमती वक्त इनके चक्कर में बर्बाद कर दिया। 



Friday, July 27, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                         बढ़ती उम्मीदों का ओलिंपिक 



देश के आम आदमी के लिए बहुत सुखद दौर नहीं है। एक लाचार सरकार, अवरोधक विपक्ष, डांवाडोल अर्थव्यवस्था और मानसून की कमजोर स्थिति के साथ यहां तक कि इस मौसम में नरम रहने वाला टमाटर भी कुछ जगहों पर ६० रुपए किलो तक बिक रहा है। ऐसे में २०१२ के लंदन ओलिंपिक के होने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। यदि प्राचीन ओलिंपिक खेलों ने युद्ध से राहत दिलाई, तो इसका आधुनिक अवतार लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाता है। जैसा कि ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था- 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।' 




लेकिन जहां दुनिया ओलिंपिक की भावना में डूबी है, वहीं भारत की भूमिका महज उत्साही दर्शक तक ही सीमित रही है। हॉकी में आठ स्वर्ण पदक प्राचीन दौर की धुंधली-सी यादों को प्रतिबिंबित करते हैं। व्यक्तिगत स्पर्धा में चार कांस्य, एक रजत और एक स्वर्ण हमारे एक-अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के हिसाब से दयनीय स्थिति पेश करते हैं। यहां तक कि जमैका जैसा पिद्दी देश (जिसकी आबादी मुंबई के किसी उपनगरीय इलाके जितनी होगी) भी वर्ष १९६२ में अपनी स्वतंत्रता के बाद से अब तक ५५ ओलिंपिक पदक जीत चुका है। 
हालांकि अब यह तस्वीर बदल सकती है। इससे पहले कभी कोई भारतीय दल ओलिंपिक खेलों में इतनी ऊंची उम्मीदों के साथ नहीं गया। आठ साल पहले एथेंस में जब राज्यवद्र्धन राठौर ने रजत पदक जीता तो हम दंग रह गए। इसी तरह बीजिंग में अभिनव बिंद्रा द्वारा स्वर्ण पदक पर निशाना साधने पर हमें सुखद आश्चर्य हुआ। मगर इस बार यदि हम लंदन से कम से कम आधा दर्जन पदक लेकर नहीं लौटते तो हमें वास्तव में नाउम्मीदी होगी। 'लंदन २०१२' इस लिहाज से भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। 


आखिर इस कायाकल्प के लिए कौन जिम्मेदार है। आखिरकार खेल संगठनों में जमे बाबू-अधिकारी तो वही हैं और इनमें से कुछ तो खेलों की इस दावत में पहुंच भी रहे हैं। अधिकांश खेल संघ अभी भी उसी निरंकुश, माई-बाप शैली में चलाए जा रहे हैं। सरकारें अभी भी खेलों को कम प्रोत्साहन देती हैं। हमारे स्कूली सिस्टम में खेल मैदानों की अभी भी बेहद कमी है, जबकि प्राइवेट सेक्टर को क्रिकेट के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता। यदि भारतीय ओलिंपिक खेल का ग्राफ ऊपर उठ रहा है तो यह इस सिस्टम के बावजूद है, न कि इसकी वजह से। 
ओलिंपिक की आभा को तीन प्रतिस्पद्र्धी वैश्विक नजरियों से जोड़कर देखा जा सकता है। पहली तो यह धारणा कि खेल किसी राष्ट्र की परम जीत का प्रतीक होते हैं। शीत युद्ध के दौर में सोवियत रूस समेत कम्युनिस्ट ब्लॉक के तमाम देश ओलिंपिक खेलों को अपनी विचारधारा की श्रेष्ठता स्थापित करने के एक अवसर के रूप में देखते थे। साम्यवाद की बेहद गोपनीय और अनुशासित दुनिया में प्रशिक्षित उनके एथलीटों की उपलब्धियों को इस तरह दर्शाया गया, जिससे उनके राजनीतिक तंत्र की 'श्रेष्ठता' साबित हो सके। सोवियतों, पूर्वी जर्मनों और क्यूबाइयों द्वारा १९७० व १९८० के दशक में सफलतापूर्वक किए गए इस काम को हाल के वर्षों में चीनियों ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। 




इसका दूसरा सफल ओलिंपिक मॉडल अमेरिकियों द्वारा तैयार किया गया। इसके मूल में अमेरिकी 'जीवन शैली' और इस धारणा के प्रति स्वीकृति का भाव निहित था कि खुले समाज में ही खेल बेहतर ढंग से खेले जा सकते हैं, जहां पर सबको समान अवसर उपलब्ध हों। यह कोई इत्तफाक नहीं है कि जेसी ओवंस पहले अमेरिकी ओलिंपिक सुपरस्टार थे। अमेरिकी अश्वेतों को वोट डालने के अधिकार के रूप में जो चीज १९३० के दशक के चुनावों में नहीं मिल सकी थी, ओवंस ने उसे खेल के मैदान पर दिला दिया, यानी समानता और गरिमापूर्वक जीने का अधिकार। तीसरा पदक-विजेता ओलिंपिक मॉडल इस धारणा के आधार पर तैयार किया गया है कि खेल में सफलता मूलत: जन्म, प्रजाति और माहौल से जुड़ी होती है। कीनियाई व इथियोपियाई मध्य एवं लंबी दूरी की रेस में आगे होते हैं, जमैकाई फर्राटा दौड़ में, जबकि ईस्ट इंडियंस टेबल टेनिस और बैडमिंटन में हावी रहते हैं। माना जाता है कि उनकी शारीरिक बनावट इ खेलों के अनुकूल होती है और उन्हें अपने यहां ऐसा माहौल मिलता है, जिससे वे इनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें। 
हम भारतीयों ने दूसरे मॉडलों से कुछ चीजें जरूर उठाईं, लेकिन अंतत: हम अपना एक बेमिसाल मॉडल तैयार करने में कामयाब रहे। इसके केंद्र में लोकतंत्र की भावना है। खेलों के 'लोकतंत्रीकरण' में यह एहसास निहित है कि आईआईटी या आईआईएम डिग्री की तरह खेल सफलताएं भी उच्च आकांक्षी समाज में ऊपर उठने का जरिया बन सकती है। जब तक भारतीय खेल क्लब और जिमखानों में सीमित रहे, हमें बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ स्पद्र्धा में जाने का मौका नहीं मिला। जिस दिन भारतीय ओलिंपिक खेल (काफी हद तक क्रिकेट की तरह) ने मैदानों को खोजा और देश के दूरदराज के कोनों तक पहुंच बनाई, स्थिति बदलने लगी और नए हीरो पैदा होने लगे। बॉक्सिंग चैंपियन और दो बच्चों की मां एमसी मैरिकॉम हमें याद दिलाती हैं कि मणिपुर में घेराबंदियों और उपद्रवों के अलावा भी कुछ हैं। दीपिका कुमारी की गाथा इस बात का सबूत है कि झारखंड की आदिवासी लड़कियां तमाम बाधाओं को पार करते हुए तीरंदाजी जैसे मुश्किल खेल में अपना मुकाम बना सकती हैं। मणिपुर और झारखंड जैसे राज्यों का राष्ट्रीय खेलों में बढ़ता प्रभुत्व एक स्वस्थ संकेत और उछाल मारती आकांक्षाओं का सबूत है, जिन्हें अब सामाजिक या आर्थिक उपेक्षाएं रोक नहीं सकतीं। 


राजनीति की दुकान बंद हो चुकी है, जिस पर वंशवादियों का प्रभुत्व था। आर्थिक अवसरों पर भी लोगों का एकाधिकार लगता है, जिन्हें बेहतर शिक्षा सहज उपलब्ध है। यह सिर्फ खेल के मैदान ही हैं, जहां नियम अब कहीं ज्यादा निष्पक्ष हैं, जहां पर व्यक्तिगत विकास को सीधे तौर पर प्रतिभा और दृढ़ संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हम अब भी ओलिंपिक महाशक्तियों से बहुत पीछे हो सकते हैं, लेकिन फासला धीरे-धीरे घट रहा है। २०२० तक यदि भारतीय पदक तालिका दहाई अंकों तक पहुंच जाए तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। शीर्ष की ओर हमारा यह सफर अभी शुरू हुआ है। 


भारतीय हॉकी 
टीम ने वर्ष १९२८ से १९८० के दौरान हुए १२ ओलिंपिक खेलों में ११ बार पदक जीते। 
वर्ष २००८ में हुए बीजिंग ओलिंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों ने ३ पदक (एक स्वर्ण व दो कांस्य) अर्जित किए थे। 
मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव 
ओलिंपिक खेल लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाते हैं। ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था - 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।' 


राजदीप सरदेसाई 




लेखक आईबीएन १८ नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं। 
'लंदन २०१२' भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। 


Tuesday, July 24, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                                   कांग्रेस कोई अड़ंगा नहीं 



केंद्र सरकार को लकवा क्यों मार गया है? जो सरकार अपने पहले पांच वर्षों में एक के बाद एक सफलता के नए प्रतिमान कायम कर रही थी, उसे उसकी दूसरी पाली में क्या हो गया है? वह जड़-भरत क्यों बन गई है? प्रणब मुखर्जी की प्रचंड विजय दिल बहलाने के लिए अच्छी खबर है, लेकिन कांग्रेस अब कितनी लोकप्रिय रह गई है, इसे कांग्रेसियों से ज्यादा कौन जानता है? पांच राज्यों में हुए पिछले चुनाव और आंध्र के नतीजे कौन-सा संदेश दे रहे हैं? इन चुनावों ने कांग्रेस के कुलदीपक को भी लगभग बुझा दिया है। अब तो कांग्रेस के पास तुरूप का एक ही पत्ता रह गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांग लिया जाए और उनकी जगह किसी नए नेता को प्रधानमंत्री पद पर बिठा दिया जाए। यदि इस पद पर राहुल गांधी बैठ जाएं तो क्या वे सरकार में जान फूंक सकते हैं? यदि फूंकदें तो सचमुच चमत्कार हो जाए, लेकिन पहला प्रश्न यह है कि वे अभी तक किसी भी सरकारी जिम्मेदारी से बचते क्यों रहे? क्या उनके मन में यह गणित रहा कि वे तो इस दुकान के भावी मालिक हैं? वे किसी के मातहत क्यों रहें? यदि वे बनते तो क्या बनते? राज्यमंत्री या मंत्री बनते? ज्योतिरादित्य सिंधिया या जयराम रमेश की तरह। उन्हें प्रधानमंत्री की सरपरस्ती स्वीकार करनी ही पड़ती! क्या युवराज के लिए यह हतक नहीं होती? ये बात दूसरी है कि मनमोहन सिंहजी ऐसे विलक्षण प्रधानमंत्री हैं कि वे अपनी कुर्सी से दो इंच ऊपर ही बैठते हैं। कुर्सी का गुरूर उन्हें रत्तीभर भी नहीं है। वे किसी का अपमान नहीं कर सकते। इस तथ्य के बावजूद यदि राहुल मंत्री नहीं बने तो क्या यह माना जाए कि वे अपनी योग्यता को कसौटी पर चढ़ाने से अब तक डरते रहे? यदि ऐसा है तो उनकी योग्यता दूसरे ढंग से कसौटी पर चढ़ गई है। बिहार और यूपी के चुनावों ने राहुल गांधी को पूरी तरह से नाप दिया है। कांग्रेस महासचिव और कांग्रेस के सर्वप्रमुख प्रचारक नेता के तौर पर देश ने उनका जितना मूल्यांकन किया, उतना कठोर मूल्यांकन वह उनके मंत्री-पद का नहीं करती। यदि वे मंत्री होते तो 60-70 में से एक होते, लेकिन अभी तो वे राहुल गांधी थे और राहुल गांधी देश में बस एक ही हैं। ऐसे में मनमोहन सिंह को उखाड़कर राहुल को रोपना कौन-सा गुल खिलाएगा, मैं नहीं जानता। डॉ. मनमोहन सिंह का शिष्ट और अनाक्रामक व्यक्तित्व इतनी सहानुभूति पैदा करेगा कि उनकी सरकार का लकवाग्रस्त होना भी देश की आंखों से ओझल हो जाएगा। 


इसका मतलब यह नहीं है कि इस सरकार की दुरवस्था के लिए मनमोहन सिंह दोषी नहीं हैं। कुछ विश्लेषकों ने सारा दोष सोनिया गांधी के मत्थे मढ़ दिया है। उनका तर्क है कि शक्ति का असली केंद्र पार्टी में है, सरकार तो उसकी कठपुतली भर है। जैसा कभी सोवियत व्यवस्था में होता था, आजकल भारत में हो रहा है। भारत में संसदीय व्यवस्था लचर-पचर है। संसदीय पार्टी के मुकाबले कांग्रेस की कार्यसमिति अधिक ताकतवर है और प्रधानमंत्री के मुकाबले कांग्रेस अध्यक्ष शक्ति की असली केंद्र्र हैं। ऊपरी तौर पर यह बात सही लगती है, लेकिन वास्तविकता क्या है? प्रधानमंत्री का पद और कांग्रेस अध्यक्ष का पद कई वर्षों बाद दो अलग-अलग व्यक्तियों के पास आया है। नरसिंह राव जैसे गैर-पुश्तैनी कांग्रेस अध्यक्ष ने भी प्रधानमंत्री बनने पर भी अध्यक्ष का पद नहीं छोड़ा। इंदिरा गांधी के जमाने में कई कांग्रेस अध्यक्ष रहे, लेकिन उनकी हैसियत क्या थी? राजीव गांधी ने दोनों पद अपने पास रखे। अब जबकि सोनिया गांधी दोनों पद अपने पास रख सकती थीं, उन्होंने स्वेच्छा से प्रधानमंत्री पद मनमोहन सिंह को दे दिया। 


यहां मूल प्रश्न यही है कि प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा या शक्तियों का कांग्रेस अध्यक्ष ने कब और कहां अतिक्रमण किया? इसके विपरीत ऐसे कई उदाहरण हैं, जब प्रधानमंत्री ने कई फैसले अपनी मर्जी से किए, जिन पर पार्टी की सहमति नहीं थी। भारत-अमेरिकी परमाणु सौदा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। इसके अलावा सोनिया की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (जिसे 'सुपर कैबिनेट' कहा जाता है) के कई फैसले सरकार ने या तो नहीं माने, या ताक पर रख दिए, या अधूरे ही माने। जैसे 'मनरेगा' का मूल दस्तावेज, खाद्य-सुरक्षा विधेयक, अल्पसंख्यक-सुरक्षा विधेयक इत्यादि। फिर भी सरकार और पार्टी के बीच असाधारण सहयोग और समझके वातावरण का सारा देश साक्षी है। सोनिया ने आज तक अपने व्यवहार से कभी दूर-दूर तक यह संकेत नहीं छोड़ा कि वे बड़ी हैं और मनमोहन सिंह छोटे हैं। इसलिए यह मानना कि पार्टी सरकार की छाती पर सवार है, तथ्यात्मक नहीं लगता। 


तो फिर समस्या क्या है? समस्या यह है कि न तो कांग्रेस अध्यक्ष राजनीतिक हैं और न ही प्रधानमंत्री! उनके भाग्य से छींका टूट पड़ा और वे वहां पहुंच गए, जहां आज हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का राजनीति के प्रति विकर्षण जगविख्यात है। वरना वे राजीव को प्रधानमंत्री बनने से विमुख क्यों करतीं? इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि वे स्वयं प्रधानमंत्री नहीं बनीं? उनके सलाहकार भी कोई द्वारिकाप्रसाद मिश्र और डी.पी. धर जैसे लोग नहीं हैं। वे पाक-साफ और सज्जन हैं, लेकिन मैदानी राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है। स्वयं सोनिया गांधी में इतनी कूवत नहीं कि भारत जैसे विशाल राष्ट्र की पेचीदा समस्याओं को समझ सकें और मान लें कि कोई उनको समझा भी दे तो वे इंदिरा गांधी की तरह मैदान में कूद पड़ें। इसीलिए किंकर्तव्यविमूढ़ता ने कांग्रेस पार्टी पर घेरा डाल दिया है। 


जहां तक मनमोहन सिंहजी का सवाल है, उनका व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों का परिपुंज है। उनकी ईमानदारी दुर्लभ है, लेकिन ऐसी ईमानदारी का कोई क्या करे, जो दुनियाभर की बेईमानी की ढाल बन गई है। कितने दुख की बात है कि इतने सज्जन और ईमानदार प्रधानमंत्री की सरकार देश की सबसे भ्रष्ट और बेईमान सरकार की तरह जानी जाएगी। यदि प्रधानमंत्री 2जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल घोटाले के गुनहगारों को पकड़कर जेल में डाल देते और उनसे सारा माल उगलवा लेते तो क्या कांग्रेस पार्टी या कांग्रेस अध्यक्ष उनका विरोध करतीं? बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों से निपटने में सरकार जरा भी राजनीतिक परिपक्वता दिखाती तो क्या सोनिया गांधी उसे रोक देतीं? यह सरकार 'मनरेगा' के तहत 100 रुपए रोज का 'बेगारी भत्ता' तो दे सकती है लेकिन अरबों-खरबों का काला धन वापस लाने में आना-कानी कर रही है। कहते हैं कि ईमानदार आदमी ही साहसी हो सकता है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कैसे ईमानदार हैं कि उनमें साहस की एक किरण भी दिखाई नहीं पड़ती। आज भी वे अगर साहस से काम लें तो हारी हुई बाजी जीत सकते हैं। उनके मार्ग में न कांग्रेस अध्यक्ष कोई बाधा हैं, न कांग्रेस पार्टी कोई अड़ंगा है। 


सोनिया गांधी 
वर्ष १९९८ में पहली बार कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं। 
सितंबर २०१० में उन्हें लगातार चौथी बार पार्टी अध्यक्ष पद के लिए चुना गया। 




साहस दिखाएं प्रधानमंत्री 
कहते हैं ईमानदार आदमी ही साहसी हो सकता है, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कैसे ईमानदार हैं कि उनमें साहस की एक किरण भी दिखाई नहीं पड़ती। आज भी वे साहस से काम लें तो हारी बाजी जीत सकते हैं। 


वेदप्रताप वैदिक 


लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं। 


समस्या यह है कि न तो कांग्रेस अध्यक्ष राजनीतिक हैं और न ही प्रधानमंत्री। कांग्रेस अध्यक्ष का राजनीति के प्रति विकर्षण जगविख्यात है। वरना वे राजीव को प्रधानमंत्री बनने से विमुख क्यों करतीं? 


Friday, July 20, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                                     सुशासन से सुधरेगी तस्वीर 



मौजूदा यूपीए सरकार के बारे में ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि उसके पास नीतियों का अभाव है। इस सरकार का २ साल का कार्यकाल अभी बाकी है और चीजों को बदलने के लिए यह बहुत कम नहीं है, लेकिन समय तेजी से निकलता जा रहा है। देश की डावांडोल अर्थव्यवस्था को संभालने, घोटालों और दिशाहीनता के बोध से संतप्त कार्यपालिका की साख को बहाल करने की जरूरत है। देशवासी लंबे समय से साफ-सुथरी व निर्णायक शासन प्रणाली की मांग कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें ऐसा नेतृत्व भी चाहिए, जो उनकी परवाह करे। जब यूपीए सरकार ने वर्ष २००९ में तमाम अनुमानों को झुठलाते हुए दमदार तरीके से लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, तो ऐसा उसके द्वारा 'आर्थिक सुधारों' के नाम पर अर्थव्यवस्था को गति देने या परमाणु करार को सफल अंजाम तक पहुंचाने की वजह से नहीं हुआ। मेरा मानना है कि यह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसे कार्यक्रमों की वजह से हुआ, जिनके क्रियान्वयन में अनेक खामियों के बावजूद भारत के निर्धनतम लोगों को भूख, कर्ज, बंधुआ मजदूरी और पलायन जैसी विपदाओं से जूझने का सम्मानित विकल्प मिला। इन कार्यक्रमों ने देश की विकासगाथा में पीछे छूट गए करोड़ों लोगों को लाभ पहुंचाया। यही वजह है कि उन्होंने पिछले आम चुनाव में यूपीए के पक्ष में वोट दिया। 
यूपीए अगर फिर से सत्ता में आना चाहता है तो ऐसी शासन व्यवस्था देनी होगी, जिसे देखकर लगे कि उसे लोगों की परवाह है। उसे अपने ऊपर लगे इस दाग को हमेशा के लिए मिटा देना होगा कि वह अनाज को अपने भंडारगृहों में सडऩे या इसे रियायती दरों पर निर्यात तो करने देती है, लेकिन इसे ऐसे लोगों में वितरित नहीं करती, जो भूखे पेट सोने को विवश हैं। इस सरकार की पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता खाद्य सुरक्षा विधेयक की राह आसान करना होनी चाहिए। देश के ज्यादातर परिवारों को रियायती खाद्य के दायरे में लाया जाए। 
इसके साथ-साथ किसानों की बदहाली पर गौर करना भी जरूरी है, जो आज भी गरीबी और नैराश्य की स्थिति से उबर नहीं पा रहे हैं। कई जगहों पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि के पुनरुद्धार के लिए खासकर छोटे व मध्यम दर्जे के किसानों को बुनियादी आय का सहारा और बीमा जैसी सुविधाएं देनी होंगी, कृषि साख का व्यापक विस्तार करना होगा, किसानों के तमाम उत्पादनों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का भरोसा देना होगा और वाटरशेड डेवलपमेंट प्रोग्रामों को दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाना होगा। इसके अलावा भूमिहीन गरीबों के लिए फिर से भूमि सुधार एजेंडा लाना होगा, जिसे हम भुला चुके हैं। 


जहां तक भ्रष्टाचार की बात है, तो इसके खिलाफ अब निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए राजनीतिक विपक्ष और विभिन्न नागरिक समूहों से बातचीत कर सर्वसम्मति के आधार पर ऐसे कानून की राह तैयार की जाए, जिसके जरिए एक मजबूत, निष्पक्ष व जवाबदेह लोकपाल की स्थापना हो सके। इसके साथ भ्रष्टाचार-निरोधी और भी उपाय किए जा सकते हैं, जिनमें लंबे समय से लंबित चुनावी, प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों को लागू करने और ग्रामीण व शहरी बस्तियों के स्तर पर शिकायतों के निवारण की प्रभावी व्यवस्था बनाना शामिल है। 
इसके अलावा महिला आरक्षण विधेयक के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने के लिए यूपीए, लेफ्ट व भाजपा के साथ बैक-रूम लॉबिंग करने की भी जरूरत है। अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए सरकार को एक ऐसी मजबूत व्यवस्था तैयार करनी होगी, जो उन तक बजटीय संसाधनों को प्रभावी ढंग से पहुंचा सके। इससे उन्हें अपने विकास संबंधी अवरोधों को पाटने में मदद मिलेगी। एक मजबूत अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम उन्हें जारी हिंसा से बेहतर ढंग से बचा सकेगा। ऐसी योजनाएं बनाई जाएं, जो देश की अनु. जाति-जनजाति बस्तियों में शुद्ध पेयजल, साफ-सफाई, चाइल्ड-केयर सेंटर व सड़क जैसी बुनियादी सेवाओं की गारंटी दे सकें। 
यूपीए सरकार ने वर्ष २००४ में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए एक कानून बनाने का वादा किया था, लेकिन अब तक उसमें ऐसा मजबूत विधेयक लाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नजर नहीं आई है, जो सांप्रदायिक दंगों से लोगों को न बचा पाने के मामले में सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह ठहरा सके। इसके अलावा अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए गरीब अल्पसंख्यक बच्चों को छात्रवृत्ति देने, उनके इलाकों में आवासीय स्कूलों की व्यवस्था करने के अलावा ऐसी योजनाएं भी चलाई जा सकती हैं, जो उनकी बस्तियों में बुनियादी सेवाओं की गारंटी दे सकें। 
भारत के अशांत प्रदेशों में लोगों के जख्मोंपर मरहम लगाने के लिए मानवाधिकारों के प्रति नई वचनबद्धता की आवश्यकता है। एनकाउंटर किलिंग व टॉर्चर को खत्म व दंडित किया जाए और एएफएसपीए, सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, अशांत क्षेत्र अधिनियम जैसे कानूनों को निरस्त किया जाए। इससे इन राज्यों में सुलह और मेल-मिलाप की नई मानसिकता तैयार होगी। यहां की महिलाओं, बच्चों, युवाओं और रोजगार के विकास के लिए स्पेशल पैकेज भी दिया जाए। 
लोक-स्वास्थ्य सेवाओं में सरकारी निवेश बढ़ाने की जरूरत है। इसके अलावा मुफ्त या सस्ती जेनरिक दवाओं के लिए भी योजना बनाई जाए। इसके लिए राजस्थान के सफल प्रयोग को आधार बनाया जा सकता है। शहरों में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले व स्ट्रीट वेंडर्स के लिए ऐसे कानून व योजनाएं बनानी होंगी, जो इन्हें निश्चित अवधि के लिए जमीन का अधिकार और बुनियादी सुविधाएं दे सकें। लोग सरकार से सिर्फ कीमतों को नियंत्रित रखने, आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और स्वच्छ शासन मुहैया कराने की उम्मीद नहीं करते। वे अपने जीवन को ज्यादा सम्मानजनक बनाने के अपने रोजमर्रा के संघर्ष में भी उससे मदद की उम्मीद करते हैं। यह ऐसी उम्मीद है, जिसे सरकारें चुने जाने के बाद आसानी से भूल जाती हैं। 


(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।) 
महिला आरक्षण विधेयक ९ मार्च २०१० को राज्यसभा में पारित हो चुका है। 
महिलाओं के लिए लोकसभा व राज्य विधानसभाओं में ३३ फीसदी सीटें आरक्षित करने की पैरवी करने वाले इस विधेयक का संसद के निचले सदन में पारित होना अभी बाकी है। 

Thursday, July 19, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                                         'सत्यमेव जयते' के मायने '

पिछले कुछ हफ्तों से हम बॉलीवुड के सुपरस्टार आमिर खान को टेलीविजन पर प्रसारित अपने शो 'सत्यमेव जयते' में अनेक अहम सामाजिक मसलों को उठाते हुए देख रहे हैं। वे जिस अंदाज में इस शो को पेश करते हैं, वह मुझे अच्छा लगता है। हालांकि मैं जानता हूं कि कई लोगों को यह शो आकर्षित नहीं भी करता। संभवत: मैं इसकी वजह भी जानता हूं। इसकी कुछ खामियां तो बिलकुल स्पष्ट हैं। 



शुरुआत से देखें तो उनका यह शो हमें ऐसा आभास (कुछ हद तक झूठा भी) देता है कि यह हमारे समाज में व्याप्त बुराइयों को मिटाना चाहता है। लेकिन जब आप इसे लगातार देखते हैं, तो आपको एहसास होता है कि आमिर कोई समाज सुधारक नहीं हैं। वे महज परिदृश्य में दिलचस्पी रखने वाले शख्स हैं, हालांकि हम पत्रकारों की तरह नहीं। पत्रकार न सिर्फ सामाजिक बुराइयों की ओर इशारा करते हैं, वरन वे उनके खिलाफ अभियान भी चलाते हैं। जिस चीज में उन्हें भरोसा होता है, वहां वे अपनी गर्दन फंसाए रहते हैं। आमिर ऐसा कुछ नहीं करते। हां यह जरूर है कि उन्होंने एक पत्रकार की टोन और हाव-भाव को अपना लिया है। वह आपके समक्ष समस्या पेश करते हैं और उसके बाद पीछे हट जाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि राजनीतिक व्यवस्था इसे दुरुस्त करेगी। जबकि हम सब जानते हैं कि यह कभी नहीं होने वाला। इस लिहाज से यह एक भावुकताप्रधान शो है, जिसे देखकर आपके आंसू निकल सकते हैं। लेकिन इससे आपके आसपास की दुनिया में बदलाव नहीं आएगा। इसकी ऐसी मंशा भी नजर नहीं आती। 



इसी बात से और भी हताशा होती है। जब कोई आपको यह बताए कि समाज में क्या गलत हो रहा है तो आप उस शख्स से उम्मीद करते हैं कि वह इसे दुरुस्त करेगा (जैसा कि कोई लीडर कर सकता है, यदि उसकी वास्तव में मंशा है तो) या हमारे राजनीतिक तंत्र पर इतना दबाव डालेगा कि वह कुछ करने के लिए मजबूर हो जाए (जैसा कि कोई पत्रकार करने की कोशिश भी करता है, हर बार नहीं मगर ज्यादा सफलता के साथ)। लेकिन 'सत्यमेव जयते' ऐसा कुछ करता नजर नहीं आता। शो के दौरान आमिर को कई बार हम आंसू बहाते हुए देखते हैं। उनके साथ हमारी भी आंखें डबडबा जाती हैं। लेकिन अगले हफ्ते हम एक नई समस्या, एक नए भावुकतापूर्ण शो, एक और भाव-विरेचन की ओर बढ़ जाते हैं। कोई नहीं जानता कि इन तमाम दुखद गाथाओं के साथ क्या किया जाए। यदि ये किसी अखबार में प्रकाशित होतीं तो लोग संभवत: जनहित याचिकाएं दायर करते या सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगते हुए यह देखते कि वे किस तरह मामले को आगे तक ले जा सकते हैं, जिससे सरकार कुछ करने के लिए मजबूर हो जाए। हम सब जानते हैं कि कोई भी सरकार स्वेच्छा से काम नहीं करती। चूंकि आमिर यहां पर मुख्य वार्ताकार की भूमिका में हैं, लिहाजा लोग उनसे ऐसा करने की उम्मीद करते हैं। 


फिल्म जगत के सितारे भले ही रुपहले परदे पर लार्जर दैन लाइफ किरदार में दिखाई दें, लेकिन जब राजनीतिक तंत्र से जूझने की बात आती है तो उन्हें इस बारे मे कुछ भी पता नहीं होता। कई बार तो मुझे अंदेशा होता है कि वे ऐसा करना भी नहीं चाहते। अपने रील लाइफ किरदारों से इतर रियल लाइफ में वे राजनेताओं को दुश्मनों की तरह नहीं देखते। वे उन्हें अपने साथी समूह के तौर पर देखते हैं - ऐसे लोग जिनके पास पावर व पैसा है। दूसरी ओर पत्रकार अक्सर लीक से हटकर स्टोरीज की तलाश में अपना जीवन जोखिम में डालते हैं। मैं इस बात को इसलिए जानता हूं क्योंकि दूसरे कई पत्रकारों की तरह मैंने भी अनगिनत अदालती मुकदमों, उत्पीडऩ, डांट-डपट और यहां तक कि जान से मारने की धमकियों का सामना किया है। लेकिन हम इसे अपने हिसाब से लेते हैं, क्योंकि हम इसे अपने जॉब की तरह देखते हैं। लेकिन कोई फिल्मी सितारा यह नहीं समझेगा कि सच्चाई को उजागर करना उसका जॉब है। उसका जॉब तो फंतासी रचना है। इसलिए भले ही वह कभीकभार किसी मुद्दे के पक्ष में आकर खड़ा हो जाए, लेकिन जब चीजें गंभीर होने लगें तो वह सबसे पहले किनारे हो जाएगा। मैं इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं देता। आखिर वे यह सब करने के लिए तो घर से नहीं निकले हैं।


यही इस शो की सबसे बड़ी खामी है। आमिर सितारों से संबंधित इस धारणा को तोडऩे की अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन यह उनके हाथ में नहीं है। उन्हें वापस जाकर फिल्मों में काम करन होगा। आखिरकार 'सत्यमेव जयते' उनके लिए एक टीवी शो ही तो है। यह उनकी जिंदगी नहीं है। फिर भी एक पत्रकार की टोन अपनाते हुए वह ऐसा जताते हैं, मानो अपने द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रति सही मायनों में काफी चिंतित हैं। यहीं पर विरोधाभास नजर आता है और यहीं आकर 'सत्यमेव जयते' नाकाम होता लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आमिर एक समाधान के माध्यम से मुद्दों को नहीं देख सकते और न ही देखेंगे। वह अच्छे इंसान हैं, लेकिन बदलाव के प्रवर्तक नहीं। वह एक अभिनेता, एक रोल मॉडल होने के अलावा एक पत्रकार की भूमिका के लिए आकर्षक विकल्प हो सकते हैं। लेकिन न तो उनमें बदलाव लाने की मंशा है और न ही इसके प्रति कोई जिद। उनके पास ऐसा करने के लिए समय भी नहीं है। उनके लिए यह महज एक टीवी शो है। यह उनकी जिंदगी नहीं है और न ही जीवन का उद्देश्य। 


लेकिन हां, 'सत्यमेव जयते' से आखिरकार बदलाव आएगा। दरअसल हम जिस किसी भी चीज को पसंद करते हैं, वह अपना प्रभाव जरूर छोड़ती है। तत्क्षण नहीं तो बाद में ही सही, लेकिन ये प्रभाव नजर जरूर आते हैं। यही कारण है कि इस शो का होना इतनी अहमियत रखता है। यह इसलिए अहम है कि आमिर ने इसे एक उद्देश्य की तरह देखा, भले तेरह हफ्तों की अवधि के लिए ही सही। अब आम जनजीवन को बीड़ा उठाना होगा। इतिहास को इसे आत्मसात करना होगा। आपको व हमें इसे आगे ले जाना होगा। आमिर खान का काम तो खैर १३ एपिसोड के बाद खत्म हो जाएगा। 


आमिर खान का शो 'सत्यमेव जयते' स्टार नेटवर्क के विभिन्न चैनलों के अलावा दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर एक साथ प्रसारित होता है। 
यह निजी चैनल नेटवर्क के साथ-साथ सरकारी चैनल पर प्रसारित होने वाला देश का पहला शो है। 


शो की अहमियत 
'सत्यमेव जयते' से आखिरकार बदलाव आएगा। हम जिस चीज को पसंद करते हैं, वह देर-सबेर अपना प्रभाव जरूर छोड़ती है। यही कारण है कि इस शो का होना इतनी अहमियत रखता है। 


प्रीतीश नंदी 
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं। 
 आमिर खान एक बेहतरीन अभिनेता व रोल मॉडल होने के अलावा एक पत्रकार की भूमिका के लिए आकर्षक विकल्प हो सकते हैं। लेकिन न तो उनमें बदलाव लाने की मंशा है और न ही इसके प्रति कोई जिद। उनके पास ऐसा करने के लिए समय भी नहीं है।


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