Wednesday, August 1, 2012

संपादकीय अग्रलेख

                                       टूटी खिड़कियों वाला इलाका 



देश का कोई इलाका किस तरह क्रमश: खतरनाक आपराधिक गतिविधियों का अड्डा बन जाता है? इस बाबत अस्सी के दशक में अमेरिका के दो समाजशास्त्रियों जेम्स क्यू विलसन और जॉर्ज एल केलिंग ने टूटी खिड़कियों (दि ब्रोकन विंडोज) नामक एक नायाब थ्योरी पेश की थी। उनके अनुसार बड़ी अराजकता की शुरुआत अक्सर एक टूटी खिड़की करती है। सड़क से दिखती उपेक्षित मकान की वह खिड़की आवारागर्दों को उसके बाकी खिड़की दरवाजों में भी तोडफ़ोड़ करने को उकसाती है। अगर फिर भी कोई हरकत नहीं होती, तो आपराधिक तत्व दरवाजे तोड़कर लावारिस घर के भीतर स्थायी पैठ बना लेते हैं और घर उनके तमाम आपराधिक कामों का अवैध अड्डा बन बैठता है। इस बिंदु पर पुलिस प्रशासन हरकत में आए भी तो उसे आजमूदा तरीकों से सहज पटा लिया जाता है और फिर तो अघोषित प्रशासकीय अनदेखी तले दूसरे अपराधी गुटों की भी वहां आवाजाही होने लगती है। अंतत: शरीफ लोग तो मजबूरी में उस बदनाम और खतरनाक इलाके से भागने लगते हैं और इलाका अवैध माल से लेकर जबरिया कब्जे या चुनावी लड़ाई में काम आने वाले बाहुबली तक का बिक्री केंद्र बन जाता है। 


आज भले ही असम के मुख्यमंत्री केंद्र को, केंद्र सेना को और सेना सुस्त केंद्रीय बाबूशाही को दोष दे रहे हों, लेकिन वहां भी यही हुआ है। आजादी के बाद अविभाजित पूर्वोत्तर में पहली खिड़की साठ के दशक में तोड़ी गई थी जब असमिया को पूरे इलाके की सरकारी भाषा बनाने के प्रस्ताव पर ब्रह्मपुत्र की घाटी में मैदानी और पहाड़ी मूल के कबीलों में हिंसक टकराव के दौरान हजारों मीजो विद्रोहियों ने लुशाई पहाडिय़ों में स्थिति इतनी विस्फोटक बना दी कि बीबीसी रेडियो पर घोषणा हो गई कि मीजो जिला भारत से अलग हो गया है। इसके बाद भी सख्ती के बजाय अनिर्णय और खोखली पुचकार में कई साल गुजर गए। इस दौरान इलाके में एक उग्र अलगाववादी मीजो मोर्चा बना, जिसने 1966 में भारत, बर्मा (म्यांमार) और पूर्वी पाकिस्तान के मीजो इलाकों को मिलाकर एक स्वाधीन क्षेत्र बनाने की मांग बुलंद कर दी। अंततोगत्वा जब तक हजारहां समस्याएं विमोचित करते हुए देश का भाषायी आधार पर पुनर्गठन किया गया, तब तक कई खिड़कियां टूट चुकी थीं और उग्र क्षेत्रीयता व अलगाववाद की समस्या इलाके में पैठ बना चुकी थी। इस बीच इलाके की दशा में दो और जटिल मोड़ आए। 1965 का भारत-पाक युद्ध और 1971 में बांग्लादेश का जन्म। 1971 के दौरान भारत-बांग्लादेश सीमापार से आए लाखों शरणार्थियों ने असम के ग्वालपाडा, धुबरी और कोकराझार इलाकों के अलावा त्रिपुरा तथा मेघालय में भी भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक जमीन और स्कूली इमारतों में बनाए शरणार्थी शिविरों में पनाह ली। इनमें मुसलमानों के अलावा बांग्लादेशी हिंदू, सिख और बौद्ध समुदायों के लोग भी थे। युद्ध की समाप्ति के बाद उनका एक बड़ा हिस्सा वायदे के मुताबिक वापस नहीं लौटा। लोग लगातार सीमापार से सुरक्षा बलों को चकमा या घूस देकर इलाके में आते गए और वोट बैंक के दबावों के तहत नागरिक बनकर सार्वजनिक जमीन, वनों तथा उपेक्षित सार्वजनिक भवनों में खेत-घर बनाने लगे। इन संदिग्ध नागरिकों की धरपकड़ और वापसी की व्यवस्था के बजाय राजनीतिक दल उनकी उपस्थिति का लाभ अल्पसंख्यक वोट बैंक पुष्ट करने या फिर स्थानीय जनजातियों में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काकर बहुसंख्यकों के पार्टी विशेष के पक्ष में ध्रुवीकरण को करने लगे। शह पाकर सीमापार से हथियारों, ड्रग्स और आतंकियों की अनधिकृत आवाजाही बढ़ी, साथ ही पूरी पूर्वोत्तरी सीमा में सार्वजनिक जमीन, जंगल और भवन भी अवैध अतिक्रमण का शिकार होते रहे। इस सबसे बेहद नाजुक और लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर असुरक्षित वैध स्थानीय निवासियों, कबीलों और अवैध आपराधिक घुसपैठियों के बीच तनातनी खतरनाक हद तक बढ़ती चली गई। आगे इसी क्रम में हथियारबंद नगा मणिपुर में और बोडो असम में अपनी स्वायत्तता की मांग लेकर आंदोलित हुए। 


2003 में बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्तता परिषद बनने तक परिदृश्य में अनेक बाहरी आव्रजक इलाके में आ बसे थे और स्थानीय आबादी का प्रतिशत घटने तथा उग्रवादी बोडो दस्तों की हथियारबंदी न घटने से भीतरी तथा बाहरी सभी गुट असुरक्षित महसूस करने लगे थे। जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के मामले भी लगातार बढ़ रहे थे (सिर्फ 2008 में जमीन विवाद में यहां 55 मौतेंहुईं)। 2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार असम के 27 जिलों में से 11 मुस्लिमबहुल जिलों में स्थानीय मूल के लोग अल्पसंख्यक बन गए हैं। उधर चुनाव आयोग ने भी इस इलाके में पिछले चुनावों में 1.5 लाख मतदाताओं की वैधता संदिग्ध पाई। फिर भी ये हिंसक वारदातें और क्षेत्रीय आबादी में बदलाव दिखाने वाले चुनाव आयोग तथा जनगणना आंकड़ों के साक्ष्य गंभीरता से नहीं पढ़े गए। चुनाव-दर-चुनाव क्षुद्र दलगत स्वार्थों के चलते धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के नाम पर लगातार अशांति फैलाने वालों के खतरनाक अड्डों को मौन उकसावा मिला और तिस पर संदिग्ध नागरिकता, आतंकी तत्वों की अवैध घुसपैठ और तस्करी के कुल 4 लाख संगीन मामले भी न्यायिक और प्रशासनिक सुस्ती से अनिर्णीत रहते आए। असम में ताजा हिंसा इन्हीं सबका मिलाजुला नतीजा है। 


अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका द्वारा असम से अवैध आव्रजकों को हटाने पर बने 1950 के कानून के हवाले से कहा गया है कि न्यायालय तथा राज्य सरकार 25 मार्च 1971 के बाद से राजनैतिक, धार्मिक या नागरिक उत्पीडऩ के शिकार बनकर भारत आए शरणार्थियों की पुख्ता पहचान करके उनको इस कानून में दिया सुरक्षा का वादा निभाए और शेष को वापस भेजे। पर आज की हिंसा की वजह सिर्फ अवैध घुसपैठ का दबाव नहीं। असम में भी शेष देश की तरह आबादी लगातार बढऩे से जमीन की किल्लत हो चली है और पुराने उग्रवादी बोडो दस्ते निरस्त्र नहीं किए गए। लिहाजा अब हर धर्म, जाति, जनजाति के लोगों ने वहां अपनी जमीन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए हथियारों से लैस अवैध दस्ते बना लिए हैं। ताजा झड़प से पहले वहां संथाल और बोडो भिड़ चुके हैं। इलाके की मिलीजुली आबादी में स्थानीय हिंदू बनाम बांग्लादेशी व नेपाली मूल के हिंदू बनाम मुसलमान के बीच ही नहीं, स्थानीय बोडो और बाहरी देशों (म्यांमार, बांग्लादेश) से आए बोडो गुटों के बीच भी बुआई के पहले खूनी दंगे हुए हैं। यह सारा इतिहास नए दंगों को शह दे रहा है। सिर्फ दो छात्र नेताओं की मौत या सेना के आने में चंद दिन की देरी से इतनी व्यापक हिंसा नहीं उपज सकती। 


असम में दो दर्जन से ज्यादा आदिवासी समूह रहते हैं, जिनमें से कइयों की अपनी भाषा, नृत्य शैली व परंपराएं हैं। 
रामायण, महाभारत व पुराण इत्यादि ग्रंथों में इस राज्य का 'प्रागज्योतिष' के नाम से उल्लेख मिलता है।

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