बढ़ती उम्मीदों का ओलिंपिक
देश के आम आदमी के लिए बहुत सुखद दौर नहीं है। एक लाचार सरकार, अवरोधक विपक्ष, डांवाडोल अर्थव्यवस्था और मानसून की कमजोर स्थिति के साथ यहां तक कि इस मौसम में नरम रहने वाला टमाटर भी कुछ जगहों पर ६० रुपए किलो तक बिक रहा है। ऐसे में २०१२ के लंदन ओलिंपिक के होने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। यदि प्राचीन ओलिंपिक खेलों ने युद्ध से राहत दिलाई, तो इसका आधुनिक अवतार लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाता है। जैसा कि ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था- 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।'
लेकिन जहां दुनिया ओलिंपिक की भावना में डूबी है, वहीं भारत की भूमिका महज उत्साही दर्शक तक ही सीमित रही है। हॉकी में आठ स्वर्ण पदक प्राचीन दौर की धुंधली-सी यादों को प्रतिबिंबित करते हैं। व्यक्तिगत स्पर्धा में चार कांस्य, एक रजत और एक स्वर्ण हमारे एक-अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के हिसाब से दयनीय स्थिति पेश करते हैं। यहां तक कि जमैका जैसा पिद्दी देश (जिसकी आबादी मुंबई के किसी उपनगरीय इलाके जितनी होगी) भी वर्ष १९६२ में अपनी स्वतंत्रता के बाद से अब तक ५५ ओलिंपिक पदक जीत चुका है।
हालांकि अब यह तस्वीर बदल सकती है। इससे पहले कभी कोई भारतीय दल ओलिंपिक खेलों में इतनी ऊंची उम्मीदों के साथ नहीं गया। आठ साल पहले एथेंस में जब राज्यवद्र्धन राठौर ने रजत पदक जीता तो हम दंग रह गए। इसी तरह बीजिंग में अभिनव बिंद्रा द्वारा स्वर्ण पदक पर निशाना साधने पर हमें सुखद आश्चर्य हुआ। मगर इस बार यदि हम लंदन से कम से कम आधा दर्जन पदक लेकर नहीं लौटते तो हमें वास्तव में नाउम्मीदी होगी। 'लंदन २०१२' इस लिहाज से भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
आखिर इस कायाकल्प के लिए कौन जिम्मेदार है। आखिरकार खेल संगठनों में जमे बाबू-अधिकारी तो वही हैं और इनमें से कुछ तो खेलों की इस दावत में पहुंच भी रहे हैं। अधिकांश खेल संघ अभी भी उसी निरंकुश, माई-बाप शैली में चलाए जा रहे हैं। सरकारें अभी भी खेलों को कम प्रोत्साहन देती हैं। हमारे स्कूली सिस्टम में खेल मैदानों की अभी भी बेहद कमी है, जबकि प्राइवेट सेक्टर को क्रिकेट के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता। यदि भारतीय ओलिंपिक खेल का ग्राफ ऊपर उठ रहा है तो यह इस सिस्टम के बावजूद है, न कि इसकी वजह से।
ओलिंपिक की आभा को तीन प्रतिस्पद्र्धी वैश्विक नजरियों से जोड़कर देखा जा सकता है। पहली तो यह धारणा कि खेल किसी राष्ट्र की परम जीत का प्रतीक होते हैं। शीत युद्ध के दौर में सोवियत रूस समेत कम्युनिस्ट ब्लॉक के तमाम देश ओलिंपिक खेलों को अपनी विचारधारा की श्रेष्ठता स्थापित करने के एक अवसर के रूप में देखते थे। साम्यवाद की बेहद गोपनीय और अनुशासित दुनिया में प्रशिक्षित उनके एथलीटों की उपलब्धियों को इस तरह दर्शाया गया, जिससे उनके राजनीतिक तंत्र की 'श्रेष्ठता' साबित हो सके। सोवियतों, पूर्वी जर्मनों और क्यूबाइयों द्वारा १९७० व १९८० के दशक में सफलतापूर्वक किए गए इस काम को हाल के वर्षों में चीनियों ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
इसका दूसरा सफल ओलिंपिक मॉडल अमेरिकियों द्वारा तैयार किया गया। इसके मूल में अमेरिकी 'जीवन शैली' और इस धारणा के प्रति स्वीकृति का भाव निहित था कि खुले समाज में ही खेल बेहतर ढंग से खेले जा सकते हैं, जहां पर सबको समान अवसर उपलब्ध हों। यह कोई इत्तफाक नहीं है कि जेसी ओवंस पहले अमेरिकी ओलिंपिक सुपरस्टार थे। अमेरिकी अश्वेतों को वोट डालने के अधिकार के रूप में जो चीज १९३० के दशक के चुनावों में नहीं मिल सकी थी, ओवंस ने उसे खेल के मैदान पर दिला दिया, यानी समानता और गरिमापूर्वक जीने का अधिकार। तीसरा पदक-विजेता ओलिंपिक मॉडल इस धारणा के आधार पर तैयार किया गया है कि खेल में सफलता मूलत: जन्म, प्रजाति और माहौल से जुड़ी होती है। कीनियाई व इथियोपियाई मध्य एवं लंबी दूरी की रेस में आगे होते हैं, जमैकाई फर्राटा दौड़ में, जबकि ईस्ट इंडियंस टेबल टेनिस और बैडमिंटन में हावी रहते हैं। माना जाता है कि उनकी शारीरिक बनावट इ खेलों के अनुकूल होती है और उन्हें अपने यहां ऐसा माहौल मिलता है, जिससे वे इनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें।
हम भारतीयों ने दूसरे मॉडलों से कुछ चीजें जरूर उठाईं, लेकिन अंतत: हम अपना एक बेमिसाल मॉडल तैयार करने में कामयाब रहे। इसके केंद्र में लोकतंत्र की भावना है। खेलों के 'लोकतंत्रीकरण' में यह एहसास निहित है कि आईआईटी या आईआईएम डिग्री की तरह खेल सफलताएं भी उच्च आकांक्षी समाज में ऊपर उठने का जरिया बन सकती है। जब तक भारतीय खेल क्लब और जिमखानों में सीमित रहे, हमें बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ स्पद्र्धा में जाने का मौका नहीं मिला। जिस दिन भारतीय ओलिंपिक खेल (काफी हद तक क्रिकेट की तरह) ने मैदानों को खोजा और देश के दूरदराज के कोनों तक पहुंच बनाई, स्थिति बदलने लगी और नए हीरो पैदा होने लगे। बॉक्सिंग चैंपियन और दो बच्चों की मां एमसी मैरिकॉम हमें याद दिलाती हैं कि मणिपुर में घेराबंदियों और उपद्रवों के अलावा भी कुछ हैं। दीपिका कुमारी की गाथा इस बात का सबूत है कि झारखंड की आदिवासी लड़कियां तमाम बाधाओं को पार करते हुए तीरंदाजी जैसे मुश्किल खेल में अपना मुकाम बना सकती हैं। मणिपुर और झारखंड जैसे राज्यों का राष्ट्रीय खेलों में बढ़ता प्रभुत्व एक स्वस्थ संकेत और उछाल मारती आकांक्षाओं का सबूत है, जिन्हें अब सामाजिक या आर्थिक उपेक्षाएं रोक नहीं सकतीं।
राजनीति की दुकान बंद हो चुकी है, जिस पर वंशवादियों का प्रभुत्व था। आर्थिक अवसरों पर भी लोगों का एकाधिकार लगता है, जिन्हें बेहतर शिक्षा सहज उपलब्ध है। यह सिर्फ खेल के मैदान ही हैं, जहां नियम अब कहीं ज्यादा निष्पक्ष हैं, जहां पर व्यक्तिगत विकास को सीधे तौर पर प्रतिभा और दृढ़ संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हम अब भी ओलिंपिक महाशक्तियों से बहुत पीछे हो सकते हैं, लेकिन फासला धीरे-धीरे घट रहा है। २०२० तक यदि भारतीय पदक तालिका दहाई अंकों तक पहुंच जाए तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। शीर्ष की ओर हमारा यह सफर अभी शुरू हुआ है।
भारतीय हॉकी
टीम ने वर्ष १९२८ से १९८० के दौरान हुए १२ ओलिंपिक खेलों में ११ बार पदक जीते।
वर्ष २००८ में हुए बीजिंग ओलिंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों ने ३ पदक (एक स्वर्ण व दो कांस्य) अर्जित किए थे।
मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव
ओलिंपिक खेल लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाते हैं। ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था - 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।'
राजदीप सरदेसाई
लेखक आईबीएन १८ नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
'लंदन २०१२' भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
देश के आम आदमी के लिए बहुत सुखद दौर नहीं है। एक लाचार सरकार, अवरोधक विपक्ष, डांवाडोल अर्थव्यवस्था और मानसून की कमजोर स्थिति के साथ यहां तक कि इस मौसम में नरम रहने वाला टमाटर भी कुछ जगहों पर ६० रुपए किलो तक बिक रहा है। ऐसे में २०१२ के लंदन ओलिंपिक के होने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। यदि प्राचीन ओलिंपिक खेलों ने युद्ध से राहत दिलाई, तो इसका आधुनिक अवतार लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाता है। जैसा कि ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था- 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।'
लेकिन जहां दुनिया ओलिंपिक की भावना में डूबी है, वहीं भारत की भूमिका महज उत्साही दर्शक तक ही सीमित रही है। हॉकी में आठ स्वर्ण पदक प्राचीन दौर की धुंधली-सी यादों को प्रतिबिंबित करते हैं। व्यक्तिगत स्पर्धा में चार कांस्य, एक रजत और एक स्वर्ण हमारे एक-अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के हिसाब से दयनीय स्थिति पेश करते हैं। यहां तक कि जमैका जैसा पिद्दी देश (जिसकी आबादी मुंबई के किसी उपनगरीय इलाके जितनी होगी) भी वर्ष १९६२ में अपनी स्वतंत्रता के बाद से अब तक ५५ ओलिंपिक पदक जीत चुका है।
हालांकि अब यह तस्वीर बदल सकती है। इससे पहले कभी कोई भारतीय दल ओलिंपिक खेलों में इतनी ऊंची उम्मीदों के साथ नहीं गया। आठ साल पहले एथेंस में जब राज्यवद्र्धन राठौर ने रजत पदक जीता तो हम दंग रह गए। इसी तरह बीजिंग में अभिनव बिंद्रा द्वारा स्वर्ण पदक पर निशाना साधने पर हमें सुखद आश्चर्य हुआ। मगर इस बार यदि हम लंदन से कम से कम आधा दर्जन पदक लेकर नहीं लौटते तो हमें वास्तव में नाउम्मीदी होगी। 'लंदन २०१२' इस लिहाज से भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
आखिर इस कायाकल्प के लिए कौन जिम्मेदार है। आखिरकार खेल संगठनों में जमे बाबू-अधिकारी तो वही हैं और इनमें से कुछ तो खेलों की इस दावत में पहुंच भी रहे हैं। अधिकांश खेल संघ अभी भी उसी निरंकुश, माई-बाप शैली में चलाए जा रहे हैं। सरकारें अभी भी खेलों को कम प्रोत्साहन देती हैं। हमारे स्कूली सिस्टम में खेल मैदानों की अभी भी बेहद कमी है, जबकि प्राइवेट सेक्टर को क्रिकेट के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता। यदि भारतीय ओलिंपिक खेल का ग्राफ ऊपर उठ रहा है तो यह इस सिस्टम के बावजूद है, न कि इसकी वजह से।
ओलिंपिक की आभा को तीन प्रतिस्पद्र्धी वैश्विक नजरियों से जोड़कर देखा जा सकता है। पहली तो यह धारणा कि खेल किसी राष्ट्र की परम जीत का प्रतीक होते हैं। शीत युद्ध के दौर में सोवियत रूस समेत कम्युनिस्ट ब्लॉक के तमाम देश ओलिंपिक खेलों को अपनी विचारधारा की श्रेष्ठता स्थापित करने के एक अवसर के रूप में देखते थे। साम्यवाद की बेहद गोपनीय और अनुशासित दुनिया में प्रशिक्षित उनके एथलीटों की उपलब्धियों को इस तरह दर्शाया गया, जिससे उनके राजनीतिक तंत्र की 'श्रेष्ठता' साबित हो सके। सोवियतों, पूर्वी जर्मनों और क्यूबाइयों द्वारा १९७० व १९८० के दशक में सफलतापूर्वक किए गए इस काम को हाल के वर्षों में चीनियों ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
इसका दूसरा सफल ओलिंपिक मॉडल अमेरिकियों द्वारा तैयार किया गया। इसके मूल में अमेरिकी 'जीवन शैली' और इस धारणा के प्रति स्वीकृति का भाव निहित था कि खुले समाज में ही खेल बेहतर ढंग से खेले जा सकते हैं, जहां पर सबको समान अवसर उपलब्ध हों। यह कोई इत्तफाक नहीं है कि जेसी ओवंस पहले अमेरिकी ओलिंपिक सुपरस्टार थे। अमेरिकी अश्वेतों को वोट डालने के अधिकार के रूप में जो चीज १९३० के दशक के चुनावों में नहीं मिल सकी थी, ओवंस ने उसे खेल के मैदान पर दिला दिया, यानी समानता और गरिमापूर्वक जीने का अधिकार। तीसरा पदक-विजेता ओलिंपिक मॉडल इस धारणा के आधार पर तैयार किया गया है कि खेल में सफलता मूलत: जन्म, प्रजाति और माहौल से जुड़ी होती है। कीनियाई व इथियोपियाई मध्य एवं लंबी दूरी की रेस में आगे होते हैं, जमैकाई फर्राटा दौड़ में, जबकि ईस्ट इंडियंस टेबल टेनिस और बैडमिंटन में हावी रहते हैं। माना जाता है कि उनकी शारीरिक बनावट इ खेलों के अनुकूल होती है और उन्हें अपने यहां ऐसा माहौल मिलता है, जिससे वे इनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें।
हम भारतीयों ने दूसरे मॉडलों से कुछ चीजें जरूर उठाईं, लेकिन अंतत: हम अपना एक बेमिसाल मॉडल तैयार करने में कामयाब रहे। इसके केंद्र में लोकतंत्र की भावना है। खेलों के 'लोकतंत्रीकरण' में यह एहसास निहित है कि आईआईटी या आईआईएम डिग्री की तरह खेल सफलताएं भी उच्च आकांक्षी समाज में ऊपर उठने का जरिया बन सकती है। जब तक भारतीय खेल क्लब और जिमखानों में सीमित रहे, हमें बेहतरीन प्रतिभाओं के साथ स्पद्र्धा में जाने का मौका नहीं मिला। जिस दिन भारतीय ओलिंपिक खेल (काफी हद तक क्रिकेट की तरह) ने मैदानों को खोजा और देश के दूरदराज के कोनों तक पहुंच बनाई, स्थिति बदलने लगी और नए हीरो पैदा होने लगे। बॉक्सिंग चैंपियन और दो बच्चों की मां एमसी मैरिकॉम हमें याद दिलाती हैं कि मणिपुर में घेराबंदियों और उपद्रवों के अलावा भी कुछ हैं। दीपिका कुमारी की गाथा इस बात का सबूत है कि झारखंड की आदिवासी लड़कियां तमाम बाधाओं को पार करते हुए तीरंदाजी जैसे मुश्किल खेल में अपना मुकाम बना सकती हैं। मणिपुर और झारखंड जैसे राज्यों का राष्ट्रीय खेलों में बढ़ता प्रभुत्व एक स्वस्थ संकेत और उछाल मारती आकांक्षाओं का सबूत है, जिन्हें अब सामाजिक या आर्थिक उपेक्षाएं रोक नहीं सकतीं।
राजनीति की दुकान बंद हो चुकी है, जिस पर वंशवादियों का प्रभुत्व था। आर्थिक अवसरों पर भी लोगों का एकाधिकार लगता है, जिन्हें बेहतर शिक्षा सहज उपलब्ध है। यह सिर्फ खेल के मैदान ही हैं, जहां नियम अब कहीं ज्यादा निष्पक्ष हैं, जहां पर व्यक्तिगत विकास को सीधे तौर पर प्रतिभा और दृढ़ संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हम अब भी ओलिंपिक महाशक्तियों से बहुत पीछे हो सकते हैं, लेकिन फासला धीरे-धीरे घट रहा है। २०२० तक यदि भारतीय पदक तालिका दहाई अंकों तक पहुंच जाए तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। शीर्ष की ओर हमारा यह सफर अभी शुरू हुआ है।
भारतीय हॉकी
टीम ने वर्ष १९२८ से १९८० के दौरान हुए १२ ओलिंपिक खेलों में ११ बार पदक जीते।
वर्ष २००८ में हुए बीजिंग ओलिंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों ने ३ पदक (एक स्वर्ण व दो कांस्य) अर्जित किए थे।
मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव
ओलिंपिक खेल लोगों में उम्मीद और सकारात्मकता जगाते हैं। ओलिंपिक मूवमेंट के संस्थापक बैरन पियरे डी कौबर्टिन ने कहा था - 'ओलिंपिक खेल मानवता के वसंत का चार-सालाना उत्सव हैं।'
राजदीप सरदेसाई
लेखक आईबीएन १८ नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।
'लंदन २०१२' भारतीय ओलिंपिक खेलों के लिए एक ऐसा मुकाम हो सकता है, जहां से हम औसत प्रदर्शन का जश्न मनाने की वर्षों की प्रवृत्ति से उबरते हुए उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।
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