बोझ नहीं, जिम्मेदारी हैं बुजुर्ग
फिलहाल यह नाममात्र की सरकारी पेंशन ज्यादातर राज्यों में चार से आठ दिनों की वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के बराबर ही है, जो सम्मानजनक जीवन के लिहाज से बेहद कम है। अधिकांश राज्यों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के चलते यह मामूली धनराशि भी जरूरतमंद बुजुर्गों तक समय से नहीं पहुंच पाती। बावजूद इसके हमारे अध्ययन दिखाते हैं कि जब यह पेंशन वंचित बुजुर्गों तक पहुंचती है, तो उनके लिए संजीवनी के मानिंद होती है।
नियमित सेक्टर में वृद्धावस्था एक समुचित पेंशन के आधार पर आराम से जीवन गुजारने का वक्त होती है। यह पेंशन उस शख्स की सेवानिवृत्ति के समय मिल रहे वेतन का अमूमन आधा होती है। परंतु यह ज्यादातर वृद्धों के लिए महज एक स्वप्न है, क्योंकि अनियमित सेक्टर में कुछ ही सामाजिक सुरक्षा योजनाएं होती हैं। इसलिए अधिकांश गरीब बुजुर्ग जोड़ों, सांस और नजर की दिक्कतों के बावजूद काम खोजने पर मजबूर होते हैं। 2004-05 में एनएसएसओ का आकलन था कि भारत में लगभग 3.7 करोड़ बुजुर्ग उत्पादक कार्यों से जुड़े हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक होगा। अधिकांश मनरेगा कार्यस्थलों पर मैंने काफी संख्या में अधेड़ या बुजुर्गों को कठोर शारीरिक श्रम से जूझते पाया है।
संयुक्त परिवार और संपत्ति पर साझा हक व्यवस्था में दरारें पडऩे, शहरों की ओर पलायन, नगरों में जगह की कमी और वैकल्पिक व्यक्तिपरक सांस्कृतिक कायदों ने मिलकर परिवार द्वारा बुजुर्गों की देखभाल करने की प्रवृत्ति को गहरा नुकसान पहुंचाया है। संयुक्त परिवारों की टूटन, अकेलापन और शारीरिक व भावनात्मक सहारे की कमी जैसे कारक उनके सम्मानजनक तरीके से जीवन बिताने की मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं। पहले गांवों के जरूरतमंद मर्द कमाने-खाने के लिए अकेले ही बाहर जाते थे और बुजुर्गों को अपनी पत्नी व बच्चों के साथ छोड़ जाते थे। अब वे अपने बीवी-बच्चों को साथ लेकर निकल जाते हैं और अपने बुजुर्गों को भीख मांगकर गुजारा करने या मरने के लिए छोड़ जाते हैं।
यूएनपीएफ के एक आकलन के मुताबिक देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में तकरीबन २० फीसदी बुजुर्ग अकेले या सिर्फ अपने जीवनसाथी के सहारे जीवन काटने को विवश हैं। तमिलनाडु में यह तादाद तो 45 फीसदी तक जा पहुंची है, जबकि गोवा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी यह दर काफी ज्यादा है।
फिलहाल पेंशन की जो सरकारी व्यवस्था है, वह बेहद मामूली है और चुनिंदा लोगों तक ही पहुंच पाती है। विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं, 'गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की जनगणना हर बार लापरवाही से किया जाने वाला काम बन ही जाती है।' वे यह भी जोड़ते हैं कि तुलनात्मक रूप से संपन्न घरों में भी बुजुर्गों की गंभीर अनदेखी हो सकती है। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की पहचान बेहद मुश्किल तो है ही, साथ ही यह जांचना भी काफी कठिन होता है कि परिवार के भीतर संसाधनों का वितरण किस तरह से होता है। इन तमाम वजहों के चलते समान सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ एक समान पेंशन का होना जरूरी है। बुजुर्गों के साथ-साथ अन्य अभावग्रस्त समूहों को भी इन दोनों योजनाओं की बेहद जरूरत है।
औपचारिक पेंशन योजनाओं के दायरे में आने वाले और आयकर देने वाले बुजुर्गों को छोड़कर बाकी सभी बुजुर्गों के लिए एक समान पेंशन की मांग पर त्वरित प्रतिक्रिया यही होती है कि यह अव्यावहारिक मांग है, जिसे माना नहीं जा सकता और देश इस तरह की पेंशन का 'बोझ' नहीं वहन कर सकेगा। यह दिलचस्प है कि सार्वजनिक नीति में बुढ़ापे के लिए ज्यादातर संदर्भों के पहले आज 'बोझ' शब्द जुड़ा होता है। हम उस संस्कृति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं, जो बुजुर्गों को ज्ञान और अनुभव के भंडार के रूप में मान देत थी और किसी मामले में उपयोगी मशविरा लेने व युवाओं को सामाजिकता का पाठ पढ़ाने के लिए उनकी ओर देखती थी। आर्थिक विकास के प्रति जुनून के इस दौर में लोगों का मूल्यांकन मुख्यत: उत्पादकों व उपभोक्ताओं के रूप में होता है। इसीलिए अब बुजुर्गों को आदर के योग्य नहीं समझा जाता।
'अनुत्पादक' बुजुर्गों की खातिर किसी भी तरह का सार्वजनिक खर्च सरकारी खजाने में निकास की तरह देखा जाता है। सामाजिक सुरक्षा को विस्तार देने की हर सरकारी कोशिश की यह कहकर आलोचना की जाती है कि इससे विकास की रफ्तार सुस्त हो जाएगी। बीमारी की तरह बुजुर्गों को भी अमूमन हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज और यहां तक उन परिवारों द्वारा भी बोझ समझा जाता है, जिसे उन्होंने बड़ा किया और जिससे वे जुड़े हैं। नोम चोम्स्की कहते हैं : 'सामाजिक सुरक्षा इस धारणा पर आधारित है कि हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं और हमारी यह सामुदायिक जिम्मेदारी है कि हम उन लोगों की देखभाल करें, जो अपनी देखभाल खुद नहीं कर सकते, चाहे फिर वे बच्चे हों या बुजुर्ग।'
जाहिर तौर पर एक समान पेंशन की मद में हमें खासा खर्च करना होगा। यदि हम देश के नब्बे फीसदी बुजुर्गों को कवर करते हुए उन्हें मासिक 2,000 रुपए की पेंशन दें तो इस पर सार्वजनिक धन का सालाना 1,92,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। देशवासियों को तय करना होगा कि क्या यह वहन न किया जाने लायक बोझ है या फिर बुजुर्गों का लंबे समय से उपेक्षित कर्ज है, जिसे अब और चुकाए बिना नहीं रहना चाहिए?
एक बांग्लादेशी लोककथा है कि एक पुत्र अपने उम्रदराज लाचार पिता को टोकरे में बिठाकर जंगल में छोडऩे के लिए जा रहा था। यह देखकर बुजुर्ग का पोता अपने पिता से कहता है, 'पिताजी, यह टोकरा जरूर वापस ले आएं। जब आप बूढ़े हो जाएंगे, तो मुझे इसकी जरूरत पड़ेगी।' कुछ अरसा पहले दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में तीन हजार वृद्ध महिला-पुरुष जुटे। उनकी मांग थी कि सभी बुजुर्गों के लिए एक समान पेंशन का प्रावधान किया जाए, जो उनके सक्षम होने की दशा में मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी-वेतन के आधे से कम न हो। फिलहाल भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 60 बरस से अधिक आयु के सभी लोगों को 400 रुपए मासिक पेंशन का प्रावधान है। राज्य सरकारों ने इस राशि में अपने-अपने हिसाब से योगदान किया है।
फिलहाल यह नाममात्र की सरकारी पेंशन ज्यादातर राज्यों में चार से आठ दिनों की वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के बराबर ही है, जो सम्मानजनक जीवन के लिहाज से बेहद कम है। अधिकांश राज्यों में भ्रष्टाचार और लापरवाही के चलते यह मामूली धनराशि भी जरूरतमंद बुजुर्गों तक समय से नहीं पहुंच पाती। बावजूद इसके हमारे अध्ययन दिखाते हैं कि जब यह पेंशन वंचित बुजुर्गों तक पहुंचती है, तो उनके लिए संजीवनी के मानिंद होती है।
नियमित सेक्टर में वृद्धावस्था एक समुचित पेंशन के आधार पर आराम से जीवन गुजारने का वक्त होती है। यह पेंशन उस शख्स की सेवानिवृत्ति के समय मिल रहे वेतन का अमूमन आधा होती है। परंतु यह ज्यादातर वृद्धों के लिए महज एक स्वप्न है, क्योंकि अनियमित सेक्टर में कुछ ही सामाजिक सुरक्षा योजनाएं होती हैं। इसलिए अधिकांश गरीब बुजुर्ग जोड़ों, सांस और नजर की दिक्कतों के बावजूद काम खोजने पर मजबूर होते हैं। 2004-05 में एनएसएसओ का आकलन था कि भारत में लगभग 3.7 करोड़ बुजुर्ग उत्पादक कार्यों से जुड़े हैं। वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक होगा। अधिकांश मनरेगा कार्यस्थलों पर मैंने काफी संख्या में अधेड़ या बुजुर्गों को कठोर शारीरिक श्रम से जूझते पाया है।
संयुक्त परिवार और संपत्ति पर साझा हक व्यवस्था में दरारें पडऩे, शहरों की ओर पलायन, नगरों में जगह की कमी और वैकल्पिक व्यक्तिपरक सांस्कृतिक कायदों ने मिलकर परिवार द्वारा बुजुर्गों की देखभाल करने की प्रवृत्ति को गहरा नुकसान पहुंचाया है। संयुक्त परिवारों की टूटन, अकेलापन और शारीरिक व भावनात्मक सहारे की कमी जैसे कारक उनके सम्मानजनक तरीके से जीवन बिताने की मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं। पहले गांवों के जरूरतमंद मर्द कमाने-खाने के लिए अकेले ही बाहर जाते थे और बुजुर्गों को अपनी पत्नी व बच्चों के साथ छोड़ जाते थे। अब वे अपने बीवी-बच्चों को साथ लेकर निकल जाते हैं और अपने बुजुर्गों को भीख मांगकर गुजारा करने या मरने के लिए छोड़ जाते हैं।
यूएनपीएफ के एक आकलन के मुताबिक देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में तकरीबन २० फीसदी बुजुर्ग अकेले या सिर्फ अपने जीवनसाथी के सहारे जीवन काटने को विवश हैं। तमिलनाडु में यह तादाद तो 45 फीसदी तक जा पहुंची है, जबकि गोवा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल में भी यह दर काफी ज्यादा है।
फिलहाल पेंशन की जो सरकारी व्यवस्था है, वह बेहद मामूली है और चुनिंदा लोगों तक ही पहुंच पाती है। विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कहते हैं, 'गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की जनगणना हर बार लापरवाही से किया जाने वाला काम बन ही जाती है।' वे यह भी जोड़ते हैं कि तुलनात्मक रूप से संपन्न घरों में भी बुजुर्गों की गंभीर अनदेखी हो सकती है। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की पहचान बेहद मुश्किल तो है ही, साथ ही यह जांचना भी काफी कठिन होता है कि परिवार के भीतर संसाधनों का वितरण किस तरह से होता है। इन तमाम वजहों के चलते समान सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ एक समान पेंशन का होना जरूरी है। बुजुर्गों के साथ-साथ अन्य अभावग्रस्त समूहों को भी इन दोनों योजनाओं की बेहद जरूरत है।
औपचारिक पेंशन योजनाओं के दायरे में आने वाले और आयकर देने वाले बुजुर्गों को छोड़कर बाकी सभी बुजुर्गों के लिए एक समान पेंशन की मांग पर त्वरित प्रतिक्रिया यही होती है कि यह अव्यावहारिक मांग है, जिसे माना नहीं जा सकता और देश इस तरह की पेंशन का 'बोझ' नहीं वहन कर सकेगा। यह दिलचस्प है कि सार्वजनिक नीति में बुढ़ापे के लिए ज्यादातर संदर्भों के पहले आज 'बोझ' शब्द जुड़ा होता है। हम उस संस्कृति को बहुत पीछे छोड़ आए हैं, जो बुजुर्गों को ज्ञान और अनुभव के भंडार के रूप में मान देत थी और किसी मामले में उपयोगी मशविरा लेने व युवाओं को सामाजिकता का पाठ पढ़ाने के लिए उनकी ओर देखती थी। आर्थिक विकास के प्रति जुनून के इस दौर में लोगों का मूल्यांकन मुख्यत: उत्पादकों व उपभोक्ताओं के रूप में होता है। इसीलिए अब बुजुर्गों को आदर के योग्य नहीं समझा जाता।
'अनुत्पादक' बुजुर्गों की खातिर किसी भी तरह का सार्वजनिक खर्च सरकारी खजाने में निकास की तरह देखा जाता है। सामाजिक सुरक्षा को विस्तार देने की हर सरकारी कोशिश की यह कहकर आलोचना की जाती है कि इससे विकास की रफ्तार सुस्त हो जाएगी। बीमारी की तरह बुजुर्गों को भी अमूमन हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे समाज और यहां तक उन परिवारों द्वारा भी बोझ समझा जाता है, जिसे उन्होंने बड़ा किया और जिससे वे जुड़े हैं। नोम चोम्स्की कहते हैं : 'सामाजिक सुरक्षा इस धारणा पर आधारित है कि हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं और हमारी यह सामुदायिक जिम्मेदारी है कि हम उन लोगों की देखभाल करें, जो अपनी देखभाल खुद नहीं कर सकते, चाहे फिर वे बच्चे हों या बुजुर्ग।'
जाहिर तौर पर एक समान पेंशन की मद में हमें खासा खर्च करना होगा। यदि हम देश के नब्बे फीसदी बुजुर्गों को कवर करते हुए उन्हें मासिक 2,000 रुपए की पेंशन दें तो इस पर सार्वजनिक धन का सालाना 1,92,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। देशवासियों को तय करना होगा कि क्या यह वहन न किया जाने लायक बोझ है या फिर बुजुर्गों का लंबे समय से उपेक्षित कर्ज है, जिसे अब और चुकाए बिना नहीं रहना चाहिए?
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