भारत के लिए सही समीकरण
कश्मीर और अफगानिस्तान के संबंध में पिछले डेढ़ साल की तमाम घटनाएं पाकिस्तान की कपटी और दगाबाजी राजनीति तथा जिहादी आतंकवादी समूहों को पोषण व संरक्षण देने के इर्द-गिर्द घूमती रहीं। श्रीनगर में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले दिन से ही मैं पाकिस्तान के कश्मीर में आतंकवाद और विध्वंस के जाल के खतरे से आगाह करता आ रहा हूं, किंतु न तो भारत सरकार और न ही अमेरिका ने इस पर ध्यान दिया। दोनों ने अल्पकालिक नजरिया अपनाए रखा। भारत के नीति निर्माता अपनी नरम, सतही सोच के लिए जाने जाते हैं और खुशफहमी में जीते हैं। तीन दशक तक सोए रहने के बाद उनकी नींद तब खुली जब दिल्ली की व्यस्त सड़कों और मुंबई के सात-सितारा होटलों में बम धमाके होने लगे, किंतु चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका के बड़े नीति नियंता भी, जो नव अमेरिकी सदी की परिकल्पना कर रहे थे, पाकिस्तान की योजना के खतरनाक परिणामों का अनुमान नहीं लगा पाए। आज कश्मीर का यथार्थ 50 हजार मौतों का मूक गवाह है। अफगानिस्तान में अमेरिका जिस दुविधा और छटपटाहट का शिकार है वह भी इसी अनदेखी का नतीजा है। यह समझने में अमेरिका को लंबा समय लग गया कि पाकिस्तान आतंकियों का प्रजनन केंद्र है और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का दगाबाज सहयोगी है। कुछ समय से अमेरिकी प्रशासन का एक वर्ग यह मानने लगा था कि पाकिस्तान बड़े पैमाने पर अमेरिका के साथ छलकपट कर रहा है। अमेरिका के नीति निर्माताओं में यह विचार तब पुष्ट हो गया जब अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपा मिला। 1-2 मई 2011 की रात को उसे अमेरिका के सील कमांडो ने मार गिराया। इस ऑपरेशन के बारे में पाकिस्तान प्रतिष्ठान में किसी को भी पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान से अमेरिका का पूरा भरोसा उठ चुका है। ओसामा बिन लादेन की पहचान में सीआइए का साथ देने वाले डॉक्टर शकील आफरीदी के साथ पाक सत्ता प्रतिष्ठान के व्यवहार से आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ पाकिस्तान की दगाबाजी स्पष्ट हो जाती है। डॉक्टर आफरीदी ने हेपेटाइटिस बी की जांच के बहाने ओसामा बिन लादेन के परिवार का खून का सैंपल लेकर डीएनए जांच में सीआइए को सहयोग दिया था। डॉ. आफरीदी को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 33 साल की सजा सुना दी गई। ऐसा करते समय इस बात का संज्ञान नहीं लिया गया कि डॉक्टर आफरीदी अल-कायदा के खिलाफ काम कर रहे थे, न कि पाकिस्तान के खिलाफ, जो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में खुद को अमेरिका का सहयोगी बताता है। आफरीदी को बेहद कड़ी सजा देने और इस प्रक्रिया में मानवाधिकार तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने से पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे पाक-अमेरिकी संबंध और बिगड़ गए। इसके बीच कुछ और घटनाओं ने आग में घी का काम किया। नवंबर 2011 में सलाहा चेकपोस्ट पर नाटो हमले में पाकिस्तान के 24 जवान मारे गए। यह हमला दोनों देशों में सूचनाओं के आदान-प्रदान में गलतफहमी के कारण गलती से हुआ था, किंतु पाकिस्तान ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई, संभवत: सोची-समझी नीति के तहत। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में नाटो फौज के लिए रसद पहुंचाने का एकमात्र उपलब्ध रास्ता बंद कर दिया। इसके अलावा बलूचिस्तान के शम्सी एयरफील्ड से ड्रोन उड़ाने की पूर्व अनुमति भी वापस ले ली। पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगने को भी कहा। अफगानिस्तान में नाटो सेना को रसद पहुंचाने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के सहयोग की अत्यंत आवश्यकता थी। अन्यथा उसे मध्य एशियाई देशों और रूस से होकर रसद पहुंचानी पड़ती, जिस पर कई गुना अधिक लागत आती। इसके बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान को स्पष्ट संकेत दे दिया कि उसके धैर्य की भी कोई सीमा है। पाक का अडि़यल रवैया देखकर अमेरिका ने सहायता राशि में कटौती कर दी। साथ ही ड्रोन हमले रोकने की पाकिस्तान की मांग भी अस्वीकार कर दी। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि वह अफगानिस्तान में नाटो सेना की सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएगा। इसी के साथ अमेरिका ने ड्रोन हमलों की संख्या बढ़ा दी। मई 2012 में हुए शिकागो सम्मेलन के अगले ही महीने अमेरिका ने आठ ड्रोन हमले किए, जिनमें अल-कायदा के कम से कम 30 आतंकी मारे गए। इन हमलों में अल-जवाहरी के बाद दूसरे नंबर का नेता अल-लिबी भी शामिल है। यह देखकर कि इस बार अमेरिका फुसलाने के बजाय डंडे से काम लेने पर आमादा है, सात माह के गतिरोध के बाद आखिर पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा और उसने अफगानिस्तान में नाटो सेना को रसद पहुंचाने के लिए रास्ता खोल दिया। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने खुद माफी नहीं मांगी, बल्कि यह काम विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने किया। इस पूरे घटनाक्रम से यह बात साफ हो जाती है कि पाकिस्तान सख्ती की भाषा समझता है, नरमी की नहीं। अफगानिस्तान में नाटो सेनाओं की आपूर्ति के लिए मार्ग खोलने से टकराव का संकट टल गया और दोनों देशों में तनाव में कुछ कमी आई, किंतु कड़वाहट शेष है। इस कठिन साझेदार से अमेरिका का भरोसा इस कदर हद तक उठ गया है कि अब वह पाकिस्तान के प्रति अपनी मूल नीति में परिवर्तन कर अब उसे सक्रिय अलगाववादी या अनिष्टकारी भूल के रूप में देखने पर विचार कर रहा है। अमेरिका और पाकिस्तान के कटु संबंधों का कश्मीर और शेष भारत पर दो रूपों में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल, पाकिस्तान सेना और आइएसआइ की पूरी ऊर्जा, संसाधान और ध्यान अफगानिस्तान से लगने वाली पश्चिमी सीमा से जुड़ी समस्याओं पर केंद्रित है। साथ ही पाकिस्तान उग्र इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों से भी जूझ रहा है, जो बेकाबू हो गए हैं और इस्लाम की अपनी गलत व्याख्या के कारण ऐसे किसी भी विचार और काम की खिलाफत करते हैं, जिनकी शरीयत पुष्टि नहीं करती। भारत को दूसरा फायदा यह हुआ कि अमेरिका को पूरा विश्वास हो गया है कि कश्मीर की आड़ में पाकिस्तान का असल मंसूबा मजहबी आतंकवाद फैलाना है। अमेरिका को यह अहसास भी हो गया है कि पाकिस्तान के इस कदम का भारत पर ही नहीं, पूरे लोकतांत्रिक विश्व पर घातक असर पड़ेगा। इन दो पहलुओं के कारण ही कश्मीर में आतंकी हिंसा में काफी कमी आई है। यह एक और सुबूत है कि इसके लिए निर्देश सीमापार से मिलते थे।
(लेखक जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं)
कश्मीर और अफगानिस्तान के संबंध में पिछले डेढ़ साल की तमाम घटनाएं पाकिस्तान की कपटी और दगाबाजी राजनीति तथा जिहादी आतंकवादी समूहों को पोषण व संरक्षण देने के इर्द-गिर्द घूमती रहीं। श्रीनगर में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले दिन से ही मैं पाकिस्तान के कश्मीर में आतंकवाद और विध्वंस के जाल के खतरे से आगाह करता आ रहा हूं, किंतु न तो भारत सरकार और न ही अमेरिका ने इस पर ध्यान दिया। दोनों ने अल्पकालिक नजरिया अपनाए रखा। भारत के नीति निर्माता अपनी नरम, सतही सोच के लिए जाने जाते हैं और खुशफहमी में जीते हैं। तीन दशक तक सोए रहने के बाद उनकी नींद तब खुली जब दिल्ली की व्यस्त सड़कों और मुंबई के सात-सितारा होटलों में बम धमाके होने लगे, किंतु चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका के बड़े नीति नियंता भी, जो नव अमेरिकी सदी की परिकल्पना कर रहे थे, पाकिस्तान की योजना के खतरनाक परिणामों का अनुमान नहीं लगा पाए। आज कश्मीर का यथार्थ 50 हजार मौतों का मूक गवाह है। अफगानिस्तान में अमेरिका जिस दुविधा और छटपटाहट का शिकार है वह भी इसी अनदेखी का नतीजा है। यह समझने में अमेरिका को लंबा समय लग गया कि पाकिस्तान आतंकियों का प्रजनन केंद्र है और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का दगाबाज सहयोगी है। कुछ समय से अमेरिकी प्रशासन का एक वर्ग यह मानने लगा था कि पाकिस्तान बड़े पैमाने पर अमेरिका के साथ छलकपट कर रहा है। अमेरिका के नीति निर्माताओं में यह विचार तब पुष्ट हो गया जब अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपा मिला। 1-2 मई 2011 की रात को उसे अमेरिका के सील कमांडो ने मार गिराया। इस ऑपरेशन के बारे में पाकिस्तान प्रतिष्ठान में किसी को भी पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान से अमेरिका का पूरा भरोसा उठ चुका है। ओसामा बिन लादेन की पहचान में सीआइए का साथ देने वाले डॉक्टर शकील आफरीदी के साथ पाक सत्ता प्रतिष्ठान के व्यवहार से आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ पाकिस्तान की दगाबाजी स्पष्ट हो जाती है। डॉक्टर आफरीदी ने हेपेटाइटिस बी की जांच के बहाने ओसामा बिन लादेन के परिवार का खून का सैंपल लेकर डीएनए जांच में सीआइए को सहयोग दिया था। डॉ. आफरीदी को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 33 साल की सजा सुना दी गई। ऐसा करते समय इस बात का संज्ञान नहीं लिया गया कि डॉक्टर आफरीदी अल-कायदा के खिलाफ काम कर रहे थे, न कि पाकिस्तान के खिलाफ, जो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में खुद को अमेरिका का सहयोगी बताता है। आफरीदी को बेहद कड़ी सजा देने और इस प्रक्रिया में मानवाधिकार तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने से पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे पाक-अमेरिकी संबंध और बिगड़ गए। इसके बीच कुछ और घटनाओं ने आग में घी का काम किया। नवंबर 2011 में सलाहा चेकपोस्ट पर नाटो हमले में पाकिस्तान के 24 जवान मारे गए। यह हमला दोनों देशों में सूचनाओं के आदान-प्रदान में गलतफहमी के कारण गलती से हुआ था, किंतु पाकिस्तान ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई, संभवत: सोची-समझी नीति के तहत। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में नाटो फौज के लिए रसद पहुंचाने का एकमात्र उपलब्ध रास्ता बंद कर दिया। इसके अलावा बलूचिस्तान के शम्सी एयरफील्ड से ड्रोन उड़ाने की पूर्व अनुमति भी वापस ले ली। पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगने को भी कहा। अफगानिस्तान में नाटो सेना को रसद पहुंचाने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के सहयोग की अत्यंत आवश्यकता थी। अन्यथा उसे मध्य एशियाई देशों और रूस से होकर रसद पहुंचानी पड़ती, जिस पर कई गुना अधिक लागत आती। इसके बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान को स्पष्ट संकेत दे दिया कि उसके धैर्य की भी कोई सीमा है। पाक का अडि़यल रवैया देखकर अमेरिका ने सहायता राशि में कटौती कर दी। साथ ही ड्रोन हमले रोकने की पाकिस्तान की मांग भी अस्वीकार कर दी। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि वह अफगानिस्तान में नाटो सेना की सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएगा। इसी के साथ अमेरिका ने ड्रोन हमलों की संख्या बढ़ा दी। मई 2012 में हुए शिकागो सम्मेलन के अगले ही महीने अमेरिका ने आठ ड्रोन हमले किए, जिनमें अल-कायदा के कम से कम 30 आतंकी मारे गए। इन हमलों में अल-जवाहरी के बाद दूसरे नंबर का नेता अल-लिबी भी शामिल है। यह देखकर कि इस बार अमेरिका फुसलाने के बजाय डंडे से काम लेने पर आमादा है, सात माह के गतिरोध के बाद आखिर पाकिस्तान को पीछे हटना पड़ा और उसने अफगानिस्तान में नाटो सेना को रसद पहुंचाने के लिए रास्ता खोल दिया। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने खुद माफी नहीं मांगी, बल्कि यह काम विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने किया। इस पूरे घटनाक्रम से यह बात साफ हो जाती है कि पाकिस्तान सख्ती की भाषा समझता है, नरमी की नहीं। अफगानिस्तान में नाटो सेनाओं की आपूर्ति के लिए मार्ग खोलने से टकराव का संकट टल गया और दोनों देशों में तनाव में कुछ कमी आई, किंतु कड़वाहट शेष है। इस कठिन साझेदार से अमेरिका का भरोसा इस कदर हद तक उठ गया है कि अब वह पाकिस्तान के प्रति अपनी मूल नीति में परिवर्तन कर अब उसे सक्रिय अलगाववादी या अनिष्टकारी भूल के रूप में देखने पर विचार कर रहा है। अमेरिका और पाकिस्तान के कटु संबंधों का कश्मीर और शेष भारत पर दो रूपों में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल, पाकिस्तान सेना और आइएसआइ की पूरी ऊर्जा, संसाधान और ध्यान अफगानिस्तान से लगने वाली पश्चिमी सीमा से जुड़ी समस्याओं पर केंद्रित है। साथ ही पाकिस्तान उग्र इस्लामी कट्टरपंथी तत्वों से भी जूझ रहा है, जो बेकाबू हो गए हैं और इस्लाम की अपनी गलत व्याख्या के कारण ऐसे किसी भी विचार और काम की खिलाफत करते हैं, जिनकी शरीयत पुष्टि नहीं करती। भारत को दूसरा फायदा यह हुआ कि अमेरिका को पूरा विश्वास हो गया है कि कश्मीर की आड़ में पाकिस्तान का असल मंसूबा मजहबी आतंकवाद फैलाना है। अमेरिका को यह अहसास भी हो गया है कि पाकिस्तान के इस कदम का भारत पर ही नहीं, पूरे लोकतांत्रिक विश्व पर घातक असर पड़ेगा। इन दो पहलुओं के कारण ही कश्मीर में आतंकी हिंसा में काफी कमी आई है। यह एक और सुबूत है कि इसके लिए निर्देश सीमापार से मिलते थे।
(लेखक जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल हैं)
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