प्रतिशोध, प्रतिहिंसा व प्रतिकार
लड़कियों के दिन ढले बाहर जाने, मोबाइल प्रयोग करने तथा प्रेम विवाह के खिलाफ बागपत की खाप पंचायत के उस फतवे से (जिसे अब मात्र एक मशवरा बताया जा रहा है) दुख जरूर होता है, पर अचरज नहीं। देश के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में औरतों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और कन्याओं की घटती तादाद वहां काफी समय से इस तरह के फरमानों का वातावरण रच चुकी है। जब ब्याह लायक युवा लड़कों के लिए दक्षिण भारत या उत्तर-पूर्व से लड़कियों को खरीदने की नौबत आ जाए तो बची-खुची युवतियों को घरों में बंद कर देना पितृसत्ताक समाज को उचित प्रतीत होने लगता है और जातिगत वोट के भूखे इलाकाई राजनेता भी इन असंवैधानिक पंचायती फैसलों पर चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन आगे बढें़। क्या हम शेष देश को महिलाओं के प्रति अपेक्षया सुरक्षित और सदय मान सकते हैं? अभी हाल में संपूर्ण साक्षरता प्राप्त केरल की एक महिला की चार साला बच्ची के साथ उसके पिता द्वारा यौन शोषण का दहलानेवाला मसला सामने आया। वारदात चूंकि कर्नाटक में घटी, उस पर जो पुलिसिया कार्रवाई वहां शुरू हुई, स्थानीय पुलिस का जो हिचकिचाहट भरा और अन्यायपरक रवैया रहा, वह दक्षिण के इस दूसरे ऊंची साक्षरता दर वाले राज्य में भी औरतों के उत्पीडऩ को लेकर एक जैसी निर्ममता दिखाता है। मातृसत्ताक उत्तर-पूर्व की मिसाल देना भी अब बेकार है। सशस्त्र बलों द्वारा औरतों के यौन उत्पीडऩ के खिलाफ बरसों से वहां एक युवती इरोम शर्मिला निष्फल भूख हड़ताल पर बैठी है और अब गुवाहाटी में पब के बाहर एक नाबालिग लड़की से भीड़ के सरेआम दुव्र्यवहार ने हमें स्तब्ध कर दिया। यह अगर सच है तो बहुत गंभीर है कि लड़की का उत्पीडऩ फिल्माकर अपने चैनल के लिए लोकप्रियता बटोरने को एक लोकल मीडियावाले ने इतनी आसानी से ठिलठिलाते मर्दों की इतनी बड़ी भीड़ जुटा ली। शर्मनाक यह भी है कि शेष देश के मीडिया ने इस नाजुक मामले की पहले खुद अपने तईं तफ्तीश करने की जगह उधार की उसी फुटेज को बारंबार चलाया और सोशल मीडिया ने भी उसे 'यूट्यूब' पर लोड कर दिया।
भारत में संविधान ने हर जाति या धार्मिक समुदाय के औरत और मर्द को बराबरी का हकदार माना है और धीमे-धीमे ही सही, अब किसी नागरिक की अस्मिता और मानवाधिकारों का सवाल सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या 'ब्रिक'नुमा आर्थिक गुटों तक सीमित नहीं रहा। वह हमारे विशाल राज-समाज के लिए भी न्याय की सही परिभाषा तय करने का बुनियादी मानक बनता गया है। लिहाजा घर की चहारदीवारी से लेकर पुलिसिया थानों तक में नागरिकों की स्वतंत्रता और उनके हकों की परिधि समझने-समझाने के लिए सामंती और लोकतांत्रिक सोच के बीच टकराव हो रहा है। इनमें से सामंतवादी मूल्यों को अक्सर पारंपरिक भारतीय और दूसरे को पश्चिमी बताया जाता है, लेकिन जिस भारत में लाखों आदिवासियों के बीच बच्चे के जन्म से बूढ़ों की मौत तक पर शराब पीने की बरसों पुरानी परंपरा हो, जहां पुराणों में मद्यपान के उल्लेख हों, वहां 2012 में भी पढ़ी-लिखी, कमाने-खानेवाली औरतों का पब में जाना इतना बड़ा विद्रोह कैसे माना जा रहा है कि मुंबई के पुलिस अधिकारी हॉकी स्टिकधारी बनकर पब के भीतर बैठी हर लड़की को गिरफ्तार करने का हुक्म देने लगें? यही मानसिकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम उम्र लड़कियों द्वारा मोबाइल का इस्तेमाल करने या देर सांझ सड़क पर बिना पुरुष के सहारे निकल जाना दंडनीय बनवा देती है और बेंगलुरु के थाने में भी यही प्रतिगामी सोच मासूम बच्ची के यौन उत्पीडऩ की शिकायत लिखाने आई मां की रपट दर्ज कर कार्रवाई शुरू करने के बजाय उसे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलाने का दोषी कह उसके आगे सवालों की झड़ी लगा देती है।
भारतीय पुरुष के जीवन में स्त्री की तुलना में हमेशा एक विस्तार रहा है, जो नई तकनीकी की मदद से उसे महिलाओं से बहुत पहले शेष दुनिया के ज्ञानभंडार से जुडऩे के नायाब मौके आजादख्याल सोशल मीडिया उपलब्ध करा चुका है। लोकतंत्र की मशीनरी भी पुरुषप्रधान राजनीति के चलते उसके लिए परिचित है, जिसके लीवरों को वह जब बदलाव चाहता है, मनपसंद हरकत को बाध्य कर सकता है। पर भीतरखाने राज-समाज औरत को मर्दों के स्तर की आजादी देना घर-परिवार के लिए खतरनाक मानता है। जभी लोकतांत्रिक विस्तार का छोर तक औरतों की दुनिया के बहुत नन्हे हिस्स को ही सुलभ हो पाया है। जो लड़कियां इसे जोखिम मोल लेकर अपने जीवन में लाना चाहती हैं, उनको तुरत क्रूर तरीके से कुचलकर परंपरावादी समूह शेष युवतियों को यह संदेश लगातार भेज रहे हैं कि बहुत स्वतंत्र बनने चलोगी तो जो हश्र तुम्हारी आजादख्याल साथिनों का हुआ, वही तुम्हारा भी हो सकता है।
लेकिन फिर भी क्या बात है कि निजी जीवन में इतने सारे पुरुष सड़कों, दफ्तरों और पबों में लड़कियों की बढ़ती तादाद से खुद को आजिज बताते हुए भी दोबारा-तिबारा उनकी उपस्थिति की तरफ आकृष्ट होकर प्रेमविवाह करते दिखते हैं? दरअसल प्रेम अब उस देश में, जहां तीन-चौथाई आबादी चालीस से कम की है, एक जीवित धड़कता हुआ शब्द है और हमारे यहां हर सार्थक नई सोच पुरानी सोच को बाहर फेंकने का काम हमेशा चुपचाप धीमे-धीमे करती है। क्या आपको याद है कि कब पारंपरिक चौके रसोई के दमघोंट उसूल घरों से यूं लुप्त हो गए कि नई पीढ़ी में बहुतों को कच्ची-पक्की रसोई का फर्क भी नहीं पता? कब स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों ने साड़ी पहनना त्याग दिया, जो उनके लिए सार्वजनिक वाहन में या साइकिलों, स्कूटी से आना-जाना खतरनाक और मुश्किल बनाता है? कब नवयौवनाओं, कुलवधुओं को ब्यूटी पार्लर से लेकर सिनेमा तक जाने में भयावह खतरा महसूस होना बंद हो गया? कैसे हर शहर में सहशिक्षा वाले कॉलेजों और किराए के फ्लैटों में बिना शादी साझा तौर से रहनेवाले कामकाजी जोड़ों की तादाद बढ़ी और वैलेंटाइन डे को स्वीकृति मिल गई? गांव की लड़कियों ने कैसे भंवे शेप कराना और नाखून रंगना, दो-दो चिप वाले मोबाइलों पर हर तरह के एप्स का प्रयोग करना और पैन कार्ड धारक बनने का मतलब सीख लिया? विवाहेतर प्रेम तो महाभारत युग से ही एक अनिश्चित-सा रिश्ता था, मगर आज फर्क यह है कि विवाह से जुड़ा रिश्ता पहले जितना टिकाऊ और निश्चित था, अब नहीं रहा। यह संकट पबों ने या मोबाइलों ने या शिक्षा ने नहीं पैदा किया और इसकी परिधि में युवतियां और युवक दोनों हैं। इसे लोकतंत्र के फैलाव के तहत युवाओं में अपने वजूद को लेकर उपजी सहज सजगता का परिणाम मानना ही सही होगा। इस सजगता की उमड़ती बाढ़ पर फतवाई रोक लगाने का प्रयास अब बहुत दिन नहीं चलनेवाला। खाप पंचायतें चाहे जो कहें।
वर्ष १८८३ में ग्रेजुएशन करने वालीं चंद्रमुखी बसु और कादम्बिनी गांगुली भारत की पहली महिला ग्रेजुएट्स थीं। तीन साल बाद कादम्बिनी गांगुली सहित आनंदी गोपाल जोशी पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र में पारंगत होने वाली पहली भारतीय महिलाएं बनीं।
सहज सजगता पर रोक
लोकतंत्र के फैलाव के तहत युवाओं में अपने वजूद को लेकर सहज सजगता उपजी है। सजगता की इस बाढ़ पर फतवाई रोक लगाने का प्रयास अब बहुत दिन नहीं चलने वाला।
मृणाल पाण्डे
लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
भारत में संविधान ने हर जाति या धार्मिक समुदाय के औरत और मर्द को बराबरी का हकदार माना है और अब किसी नागरिक की अस्मिता और मानवाधिकारों का सवाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या 'ब्रिक'नुमा आर्थिक गुटों तक सीमित नहीं रहा।
लड़कियों के दिन ढले बाहर जाने, मोबाइल प्रयोग करने तथा प्रेम विवाह के खिलाफ बागपत की खाप पंचायत के उस फतवे से (जिसे अब मात्र एक मशवरा बताया जा रहा है) दुख जरूर होता है, पर अचरज नहीं। देश के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में औरतों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और कन्याओं की घटती तादाद वहां काफी समय से इस तरह के फरमानों का वातावरण रच चुकी है। जब ब्याह लायक युवा लड़कों के लिए दक्षिण भारत या उत्तर-पूर्व से लड़कियों को खरीदने की नौबत आ जाए तो बची-खुची युवतियों को घरों में बंद कर देना पितृसत्ताक समाज को उचित प्रतीत होने लगता है और जातिगत वोट के भूखे इलाकाई राजनेता भी इन असंवैधानिक पंचायती फैसलों पर चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन आगे बढें़। क्या हम शेष देश को महिलाओं के प्रति अपेक्षया सुरक्षित और सदय मान सकते हैं? अभी हाल में संपूर्ण साक्षरता प्राप्त केरल की एक महिला की चार साला बच्ची के साथ उसके पिता द्वारा यौन शोषण का दहलानेवाला मसला सामने आया। वारदात चूंकि कर्नाटक में घटी, उस पर जो पुलिसिया कार्रवाई वहां शुरू हुई, स्थानीय पुलिस का जो हिचकिचाहट भरा और अन्यायपरक रवैया रहा, वह दक्षिण के इस दूसरे ऊंची साक्षरता दर वाले राज्य में भी औरतों के उत्पीडऩ को लेकर एक जैसी निर्ममता दिखाता है। मातृसत्ताक उत्तर-पूर्व की मिसाल देना भी अब बेकार है। सशस्त्र बलों द्वारा औरतों के यौन उत्पीडऩ के खिलाफ बरसों से वहां एक युवती इरोम शर्मिला निष्फल भूख हड़ताल पर बैठी है और अब गुवाहाटी में पब के बाहर एक नाबालिग लड़की से भीड़ के सरेआम दुव्र्यवहार ने हमें स्तब्ध कर दिया। यह अगर सच है तो बहुत गंभीर है कि लड़की का उत्पीडऩ फिल्माकर अपने चैनल के लिए लोकप्रियता बटोरने को एक लोकल मीडियावाले ने इतनी आसानी से ठिलठिलाते मर्दों की इतनी बड़ी भीड़ जुटा ली। शर्मनाक यह भी है कि शेष देश के मीडिया ने इस नाजुक मामले की पहले खुद अपने तईं तफ्तीश करने की जगह उधार की उसी फुटेज को बारंबार चलाया और सोशल मीडिया ने भी उसे 'यूट्यूब' पर लोड कर दिया।
भारत में संविधान ने हर जाति या धार्मिक समुदाय के औरत और मर्द को बराबरी का हकदार माना है और धीमे-धीमे ही सही, अब किसी नागरिक की अस्मिता और मानवाधिकारों का सवाल सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या 'ब्रिक'नुमा आर्थिक गुटों तक सीमित नहीं रहा। वह हमारे विशाल राज-समाज के लिए भी न्याय की सही परिभाषा तय करने का बुनियादी मानक बनता गया है। लिहाजा घर की चहारदीवारी से लेकर पुलिसिया थानों तक में नागरिकों की स्वतंत्रता और उनके हकों की परिधि समझने-समझाने के लिए सामंती और लोकतांत्रिक सोच के बीच टकराव हो रहा है। इनमें से सामंतवादी मूल्यों को अक्सर पारंपरिक भारतीय और दूसरे को पश्चिमी बताया जाता है, लेकिन जिस भारत में लाखों आदिवासियों के बीच बच्चे के जन्म से बूढ़ों की मौत तक पर शराब पीने की बरसों पुरानी परंपरा हो, जहां पुराणों में मद्यपान के उल्लेख हों, वहां 2012 में भी पढ़ी-लिखी, कमाने-खानेवाली औरतों का पब में जाना इतना बड़ा विद्रोह कैसे माना जा रहा है कि मुंबई के पुलिस अधिकारी हॉकी स्टिकधारी बनकर पब के भीतर बैठी हर लड़की को गिरफ्तार करने का हुक्म देने लगें? यही मानसिकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम उम्र लड़कियों द्वारा मोबाइल का इस्तेमाल करने या देर सांझ सड़क पर बिना पुरुष के सहारे निकल जाना दंडनीय बनवा देती है और बेंगलुरु के थाने में भी यही प्रतिगामी सोच मासूम बच्ची के यौन उत्पीडऩ की शिकायत लिखाने आई मां की रपट दर्ज कर कार्रवाई शुरू करने के बजाय उसे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलाने का दोषी कह उसके आगे सवालों की झड़ी लगा देती है।
भारतीय पुरुष के जीवन में स्त्री की तुलना में हमेशा एक विस्तार रहा है, जो नई तकनीकी की मदद से उसे महिलाओं से बहुत पहले शेष दुनिया के ज्ञानभंडार से जुडऩे के नायाब मौके आजादख्याल सोशल मीडिया उपलब्ध करा चुका है। लोकतंत्र की मशीनरी भी पुरुषप्रधान राजनीति के चलते उसके लिए परिचित है, जिसके लीवरों को वह जब बदलाव चाहता है, मनपसंद हरकत को बाध्य कर सकता है। पर भीतरखाने राज-समाज औरत को मर्दों के स्तर की आजादी देना घर-परिवार के लिए खतरनाक मानता है। जभी लोकतांत्रिक विस्तार का छोर तक औरतों की दुनिया के बहुत नन्हे हिस्स को ही सुलभ हो पाया है। जो लड़कियां इसे जोखिम मोल लेकर अपने जीवन में लाना चाहती हैं, उनको तुरत क्रूर तरीके से कुचलकर परंपरावादी समूह शेष युवतियों को यह संदेश लगातार भेज रहे हैं कि बहुत स्वतंत्र बनने चलोगी तो जो हश्र तुम्हारी आजादख्याल साथिनों का हुआ, वही तुम्हारा भी हो सकता है।
लेकिन फिर भी क्या बात है कि निजी जीवन में इतने सारे पुरुष सड़कों, दफ्तरों और पबों में लड़कियों की बढ़ती तादाद से खुद को आजिज बताते हुए भी दोबारा-तिबारा उनकी उपस्थिति की तरफ आकृष्ट होकर प्रेमविवाह करते दिखते हैं? दरअसल प्रेम अब उस देश में, जहां तीन-चौथाई आबादी चालीस से कम की है, एक जीवित धड़कता हुआ शब्द है और हमारे यहां हर सार्थक नई सोच पुरानी सोच को बाहर फेंकने का काम हमेशा चुपचाप धीमे-धीमे करती है। क्या आपको याद है कि कब पारंपरिक चौके रसोई के दमघोंट उसूल घरों से यूं लुप्त हो गए कि नई पीढ़ी में बहुतों को कच्ची-पक्की रसोई का फर्क भी नहीं पता? कब स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों ने साड़ी पहनना त्याग दिया, जो उनके लिए सार्वजनिक वाहन में या साइकिलों, स्कूटी से आना-जाना खतरनाक और मुश्किल बनाता है? कब नवयौवनाओं, कुलवधुओं को ब्यूटी पार्लर से लेकर सिनेमा तक जाने में भयावह खतरा महसूस होना बंद हो गया? कैसे हर शहर में सहशिक्षा वाले कॉलेजों और किराए के फ्लैटों में बिना शादी साझा तौर से रहनेवाले कामकाजी जोड़ों की तादाद बढ़ी और वैलेंटाइन डे को स्वीकृति मिल गई? गांव की लड़कियों ने कैसे भंवे शेप कराना और नाखून रंगना, दो-दो चिप वाले मोबाइलों पर हर तरह के एप्स का प्रयोग करना और पैन कार्ड धारक बनने का मतलब सीख लिया? विवाहेतर प्रेम तो महाभारत युग से ही एक अनिश्चित-सा रिश्ता था, मगर आज फर्क यह है कि विवाह से जुड़ा रिश्ता पहले जितना टिकाऊ और निश्चित था, अब नहीं रहा। यह संकट पबों ने या मोबाइलों ने या शिक्षा ने नहीं पैदा किया और इसकी परिधि में युवतियां और युवक दोनों हैं। इसे लोकतंत्र के फैलाव के तहत युवाओं में अपने वजूद को लेकर उपजी सहज सजगता का परिणाम मानना ही सही होगा। इस सजगता की उमड़ती बाढ़ पर फतवाई रोक लगाने का प्रयास अब बहुत दिन नहीं चलनेवाला। खाप पंचायतें चाहे जो कहें।
वर्ष १८८३ में ग्रेजुएशन करने वालीं चंद्रमुखी बसु और कादम्बिनी गांगुली भारत की पहली महिला ग्रेजुएट्स थीं। तीन साल बाद कादम्बिनी गांगुली सहित आनंदी गोपाल जोशी पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र में पारंगत होने वाली पहली भारतीय महिलाएं बनीं।
सहज सजगता पर रोक
लोकतंत्र के फैलाव के तहत युवाओं में अपने वजूद को लेकर सहज सजगता उपजी है। सजगता की इस बाढ़ पर फतवाई रोक लगाने का प्रयास अब बहुत दिन नहीं चलने वाला।
मृणाल पाण्डे
लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
भारत में संविधान ने हर जाति या धार्मिक समुदाय के औरत और मर्द को बराबरी का हकदार माना है और अब किसी नागरिक की अस्मिता और मानवाधिकारों का सवाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति या 'ब्रिक'नुमा आर्थिक गुटों तक सीमित नहीं रहा।

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