रीयल व मुंबइया मसाले का कॉकटेल
धनबाद जब तक सलीमा रहेगा हिन्दुस्तान के लोग चू.. बनते रहेंगे। फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर-पार्ट टू में खलनायक रामधीर सिंह का यह डॉयलाग सौ फीसदी सटीक बैठता है। फिल्म की कास्टिंग में ही यह जानकारी दी जाती है कि कथावस्तु वासेपुर (धनबाद) की सच्ची घटनाओं की मीडिया रिपोर्टिग पर आधारित है। पर, रामधीर सिंह और फैजल खान का फिल्म में जिस तरह अंत होता है, निर्माता-निर्देशक का दावा हवा हो जाता है। गैंग्स ऑफ वासेपुर-पार्ट वन का अंत बरवाअड्डा में सरदार खान को गोलियों से छलनी कर देने की घटना से हुआ था। पार्ट टू के शुरू में यही सीन दिखाया गया है। वासेपुर से उसका बेटा फैजल खान और दानिश समर्थकों के साथ पहुंचता है। पुलिस के सामने सरदार खान को मारने वाले एक व्यक्ति को दानिश गोलियों से उड़ा कर बदला लेता है। यह वाक्या सच्ची घटना से मेल नहीं खाता। 1984 में शफी खान की हत्या के बाद भागते हमलावरों में एक की स्थानीय लोगों ने पीट-पीट कर जान ले ली थी। सरदार खान की हत्या के बाद फिल्म की कहानी गैंगवार में बदल जाती है। एक तरफ फैजल होता है तो दूसरी तरफ हत्या करने वाला सुल्तान। यह कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित लगती है। शफी खान के पुत्र फहीम खान की भूमिका में फैजल अपनी मां नगमा द्वारा अब्बू की हत्या का बदला लेने के लिए उकसाए जाने के बाद फजलू का गला रेतकर वासेपुर में दबदबा कायम करता है। इसके बाद फैजल और सुल्तान के बीच जारी अदावत के दौरान फिल्म में नौ हत्या होती है। ये सीन वासेपुर गैंगवार की याद ताजा कर देते हैं। फिल्म की कहानी जैसे ही फैजल बनाम रामधीर सिंह के बीच घूमती है, सच्ची घटना का दावा झुठलाते हुए काल्पनिक बन जाती है। फिल्म में रामधीर के खिलाफ फैजल को चुनाव लड़ते दिखाया गया है। हकीकत में रामधीर सिंह ने आज तक धनबाद में कोई चुनाव नहीं लड़ा है। फहीम ने 1995 में धनबाद विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ा था। न सिर्फ राजनीतिक बल्कि व्यावसायिक धंधे को लेकर भी धनबाद में कभी सिंह मैंशन और फहीम खान के बीच टकराव के उदाहरण नहीं मिलते। हालांकि फिल्म में रामधीर और फहीम के बीच टकराव दिखाया गया है जो अटपटा लगता है। निर्माता-निर्देशक और कहानीकार से सबसे ज्यादा चूक फिल्म के समापन में हुई है। फैजल अस्पताल जाकर रामधीर को गोली मार देता है। रामधीर बचने के लिए शौचालय में पहुंच जाता है। डर से रामधीर के हाथ से पिस्तौल गिर जाती है। वह कमोड पर बैठ जाता है। कमोड पर बैठे रामधीर पर फैजल जमकर गोलियां बरसाता हैं और मुस्कुराता है। फैजल का सौतेला भाई डेफनिट भी रामधीर को गोली मारकर मुस्कुराता है। तभी पुलिस पहुंचती है और दोनों को पकड़ लेती है। वासेपुर में अपनी बादशाहत कायम करने के लिए डेफनिट सौतेले भाई फैजल को पुलिस अभिरक्षा में गोली मार देता है। इसके बाद डेफनिट और रामधीर के पुत्र को खुशी से मिलते दिखाया गया है। यह धनबाद के दर्शकों के गले नहीं उतरता। फेम में फिल्म का पेड प्रिव्यू देखकर निकले अखिलेश सिंह ने प्रतिक्रिया में कहा- फिल्म को धनबाद का चश्मा उतार कर देखने की जरूरत है। धनबाद के चश्मे से देखेंगे तो निराशा हाथ लगेगी क्योंकि फिल्म में सच्ची घटना और मुंबइया मसाला फिल्मी फॉर्मूला का घालमेल है।
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