बड़े तूफान की आहट
अपेक्षा के अनुरूप हाल ही में नोमपेन्ह में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन में दक्षिण चीन सागर विवाद का कोई हल नहीं निकल सका है, किंतु चौंकाने वाली बात यह रही कि पूरे सम्मेलन में चीन का इस कदर दबदबा रहा कि संगठन के 45 साल के इतिहास में पहली बार कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया गया। चीन बांटो और राज करो की नीति में सफल रहा। उसने जोर दिया कि दक्षिण चीन सागर विवाद बीजिंग और विरोधी दावेदारों के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है। यह इस मुद्दे का समाधान नहीं है, इसलिए दक्षिण चीन सागर में शांति किसी भी समय भंग हो सकती है। घरेलू राजनीतिक परिवर्तन के दौर में चीन अपने पड़ोसियों के साथ विवादों में उलझा हुआ है। इस क्षेत्र में टकराव से वैश्विक व्यापार के प्रवाह में रुकावट आ सकती है। दक्षिण चीन सागर से होकर विश्व का करीब आधा व्यापार होता है और इस पूरे क्षेत्र अथवा कुछ भागों पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और ब्रूनेई अपना-अपना दावा ठोंकते रहते हैं। दक्षिण चीन सागर में 213 अरब बैरल तेल होने का अनुमान है। एशिया आशंकित है कि चीन अपनी बढ़ती नौसैनिक ताकत के बल पर न केवल दक्षिण चीन सागर के तेल-समृद्ध जल पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए जीवन रेखा महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को भी अपने अधिकार में रखना चाहता है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सक्रियता पर विशेषतौर पर फिलीपींस और वियतनाम चिंता जताते रहे हैं। फिलीपींस के राष्ट्रपति तो यहां तक कह चुके हैं कि वह दक्षिण चीन सागर के विवादित क्षेत्रों में निगरानी के लिए अमेरिका से खुफिया जहाज तैनात करने की मांग कर सकते हैं। इस क्षेत्र में विवाद की शुरुआत तब हुई जब फिलीपींस की नौसेना ने शोआल के पानी में मछली पकड़ने वाले चीनी पोतों को देखा। बात तब बिगड़ गई जब चीन ने अपने पोतों को वहां से हटाने से इन्कार कर दिया। सप्ताह भर पहले ही चीन की सरकारी तेल कंपनी चाइना नेशनल ऑफशोर ऑयल कंपनी (सीएनओओसी) ने नौ ब्लॉकों में तेल की खोज के लिए टेंडर जारी कर दिया। इन क्षेत्रों पर वियतनाम भी अपना दावा करता रहा है। इस इलाके में युद्धपोतों से लैस चीनी नौसेना गश्त लगा रही है। इस मुद्दे पर चीन का सरकारी मीडिया बड़ा हल्ला मचा रहा है और फिलीपींस तथा वियतनाम जैसे देशों को कभी न भूलने वाला पाठ पढ़ाने की मांग कर रहा है। जापान ने भी चीन से अपने समुद्री दावों को स्पष्ट चिह्नित करने की मांग की है। यद्यपि इस क्षेत्र में जापान का सीधे-सीधे कुछ दांव पर नहीं लगा है, किंतु क्षेत्र में बढ़ते टकराव को रोकने के लिए वह सक्रिय भूमिका निभा रहा है। टोक्यो को चिंता सता रही है कि दक्षिण चीन सागर की घटनाओं का असर पूर्वी चीन सागर पर पड़ सकता है, जहां उसका चीन के साथ विवाद चल रहा है। दक्षिण चीन सागर विवाद समाधान का इस क्षेत्र के साथ-साथ अन्य इलाकों पर भी असर पड़ना तय है। विवादित दक्षिण चीन सागर में दावों-प्रतिदावों से उत्पन्न तनाव को खत्म करने के प्रयासों को चीन ने यह चेतावनी देकर रोक दिया है कि आसियान देशों के लिए बेहतर होगा कि वे इस मुद्दे को न उठाएं। अमेरिका उम्मीद कर रहा था कि आसियान सदस्य देश दक्षिण चीन सागर में वर्तमान और भविष्य में उठने वाले विवादों के सौहार्दपूर्ण हल के लिए इस क्षेत्र में आचार संहिता बनाएंगे। अमेरिका अंतरराष्ट्रीय जल के नियमों पर आधारित एक आचार संहिता के निर्माण के लिए आसियान देशों को प्रेरित कर रहा है। उसका मानना है कि इसके माध्यम से इस क्षेत्र में विवादों को सुलझाने में सुविधा होगी। इसीलिए वह चीन से निपटने के लिए आसियान देशों के साथ संबंध सुधार रहा है। करीब एक दशक पहले आचार संहिता पर राजी होने के बावजूद इसके अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने में बहुत कम प्रगति हुई है। इसमें प्रमुख रोड़ा चीन का यह मत बना हुआ है कि विवादों को बहुपक्षीय आधार के बजाय द्विपक्षीय आधार पर हल किया जाना चाहिए। चीन दक्षिण चीन सागर विवाद पर वार्ता आसियान के साथ एक समूह के रूप में करने के बजाय अलग-अलग देशों से व्यक्तिगत आधार पर इसलिए करना चाहता है, क्योंकि कोई भी दक्षिणपूर्वी एशियाई देश ताकत में चीन के आसपास भी नहीं है, इसलिए अलग-अलग देशों पर चीन अपनी दबंगई आसानी से चला सकता है। दक्षिण चीन सागर में नौवहन की स्वतंत्रता, अंतरराष्ट्रीयकानूनों का सम्मान और निर्बाध वैध व्यापार जैसे सिद्धांतों को लागू करने के महत्व पर जोर दिया जाना बेहद जरूरी है। वियतनाम पेट्रोलियम ब्लॉक में तेल की खोज के लिए वैश्विक निविदा जारी करके चीन ने भारत को कूटनीतिक गतिरोध में फंसा दिया है, क्योंकि इस क्षेत्र में एक ब्लॉक में एक भारतीय तेल कंपनी तेल की खोज में जुटी हुई है। इसीलिए कंबोडिया में आयोजित आइयान (एईएएन) क्षेत्रीय फोरम की बैठक में भारत ने खुलकर अपनी चिंताएं जताई थीं कि संसाधनों के दोहन में अंतराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। अकसर हाशिये पर रहकर ही संतुष्ट रहने वाला भारत अब अगर पूर्वी और दक्षिणपूर्वी एशिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहता है तो उसे इस निष्कि्रयता की विलासिता का भार उतारना होगा। इस क्षेत्र में चीन की आक्रामकता कोई नई नहीं है, किंतु इससे भारत के लिए पहली बार सीधे-सीधे समस्या खड़ी हो रही है। बीजिंग का तेजी से बढ़ता रक्षा बजट, समुद्री संप्रभुता के विस्तारित दावे, इसका आक्रामक व्यवहार, उत्तरी कोरिया व पाकिस्तान जैसे देशों को समर्थन और सैन्य ढांचे में अपारदर्शिता क्षेत्र में एक जिम्मेदार साझेदार के रूप में कार्य करने की चीन की इच्छा पर सवालिया निशान लगाते हैं। आने वाले वर्षो में दिल्ली के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती यह होगी कि वह किस प्रकार चीन के उदय से अप्रभावित रहे और उसके उद्दंडता पर अंकुश लगाए। भारत में बहुत से लोगों की दलील है कि चीन और भारत के एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था में बढ़ती हिस्सेदारी को देखते हुए दोनों देशों के बीच टकराव की संभावना नहीं है, किंतु दक्षिण चीन सागर में बढ़ते तनाव को देखते हुए आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि आर्थिक अंतरनिर्भरता टकराव को टालने का रामबाण उपाय है। भारत को बड़े ध्यान से चीन के व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए और इस उभरते हुए ड्रैगन से निपटने के लिए सही सबक सीखना चाहिए।(लेखक लंदन के किंग्स कालेज में प्रोफेसर हैं)
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